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मेरी हर आस्था का नाम हिन्दुस्तान लिख देना… जिया टोंकी

याद-ए-दानिश अखिल भारतीय मुशायरा में देर रात तक जमे रहे श्रोता, शायरों ने एक से बढ़कर एक मुशायरा पेश किया

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मेरी हर आस्था का नाम हिन्दुस्तान लिख देना... जिया टोंकी

रतलाम. कहीं शोहरत, कहीं दौलत कहीं दुकान रख देंगे, मेरे हिस्से में मजबूर की मुस्कान रख देना...बहुत पावन बहुत शीतल बहुत निर्मल है ये धरती, मेरी हर आस्था का नाम हिन्दुस्तान लिख देना...। जिंदगी एक तलाश है बाबा, चलती फिरती सी लाश है बाबा, जैसे शेर-शायरी और मुशायरा सुनाकर टोंक राजस्थान से आए डॉ. जिया टोंकी ने श्रोताओं का खूब मनोरंजन किया। कार्यक्रम था शनिवार की रात १६वां याद-ए-दानिश में आयोजित अखिल भारतीय मुशायरा का। मप्र उर्दू अकादमी संस्कृति विभाग तथा बज्म-ए-अदब द्वारा मुशायरा सेठिया गार्डन में आयोजित किया गया था। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पारस सकलेचा थे, विशेष अतिथि अनोखीलाल कटारिया और सुभाष जैन थे। इस मौके पर शब्बीर राही, अब्दुुलस्सलाम खोकर ने भी मुशायरा पढ़ा। कार्यक्रम का संचालन शफीक आबिदी (बैंगलूरु) ने किया। मुशायरे में देवास से आए अजीम देवासी ने मेरी आंखों से गलत फहमी के जाले निकले, सारे दुश्मन ही मेरे चाहने वाले निकले.. शेर से खूब वाहवाही लूटी। हमने इस मुल्क में ऐसे भी करिश्मे देखे, फर्क ***** और मुसलमान में हो नहीं सकते...हर एक छत पर परिंदे को चहकते देखे जैसे शेर से पूरे हाल में तालियों को गडग़ड़ाहड़ गूंज उठी।


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हर शख्स को अफलाक पे छाने की हवस है, कुछ और है, कुछ और जताने की हवस है... रोशन मनीष
वफा की डोर के बस छुटने से होती है, किसी अजीज के फिर रूठने से होती है...।
कुवर जावेद
हर घड़ी इश्क के खुमार में है, दिल कहां मेरे इख्तयार में है...।
-शफीक
जीतने का ये हुनर भी आजमाना चाहिए, भाइयों से जंग हो तो हार जाना चाहिए...
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