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मंदसौर का जमाई है रावण इसलिए प्रतिमा के आगे घूंघट में जाती है महिलाएं, होती है पूजा

मंदसौर का जमाई है रावण इसलिए प्रतिमा के आगे घूंघट में जाती है महिलाएं, होती है पूजा

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मंदसौर का जमाई है रावण इसलिए प्रतिमा के आगे घूंघट में जाती है महिलाएं, होती है पूजा

मंदसौर का जमाई है रावण इसलिए प्रतिमा के आगे घूंघट में जाती है महिलाएं, होती है पूजा

मंदसौर.
अधर्म पर धर्म की विजय के रुप में मनाए जाने वाले दशहरा पर्व से ५ अक्टूबर को मंदसौर में भी मनाया जाएगा। लेकिन यहां अनोखे तरीके से दशहरा मनाया जाता है। दशहरे से मंदसौर की अनोखी मान्यता जुड़ी हुई है। यहां रावण की पूजा होती है। शहर का जमाई होने के कारण महिलाएं प्रतिमा के सामने घूंघट में जाती है और सुबह पांव में लच्छा बांधकर उसकी विद्ववता की पूजा होती है तो शाम को उसके अहं का दहन के साथ अंत किया जाता है। रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका मंदसौर को माना जाता है और इसी लिए दशानन को जमाई माना जाता है। इसीलिए रावण की प्रतिमा के सामने महिलाएं घुघंट में जाती है। दशहरे के दिन रावण की प्रतिमा की सुबह के समय पूजा-अर्चना होती है और शाम को गोधुलीबेला में दहन किया जाता है। नामदेव समाज रावण की प्रतिमा की शहर के खानपुरा में बनी रावण प्रतिमा की पूजा-अर्चना करता है। बताया जाता है कि २०० सालों से भी अधिक समय से समाजजन रावण प्रतिमा की पूजा करते आ रहे है। पहले पुरानी मूर्ति थी, जो अब नए स्वरुप में स्थापित की गई। इतना ही नहीं यहां पर रोगों से दूर रहने के साथ मनोकामनाएं पूरी होने की मन्नतें भी ली जाती है।
बुद्धिभ्रष्ट होने के प्रतीक के रुप में लगा रखा गधे का सिर
खानपुरा क्षेत्र में रुंडी नामक स्थान पर रावण की प्रतिमा स्थापित है। इसके 10 सिर हैं। रावण मंदसौर का दामाद था। इसलिए महिलाएं जब प्रतिमा के सामने पहुंचती हैं तो घूंघट डाल लेती हैं। कहने को १० मुंह है, लेकिन रावण की बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी और उसने माता सीता का हरण किया था। इसलिए बुद्धिभ्रष्ट होने के प्रतीक के रुप में मुख्य मुंह के ऊपर प्रतीक के रुप में गधे का सिर लगाया गया।
अच्छाईयों के लिए करते है पूजा, बुराईयों के लिए करते है दहन
रावण विद्वान ब्राह्मण और शिवभक्त था। ऐसे में उसकी अच्छाईयों और प्रकांडता को लेकर उसकी पूजा की परंपरा शुरु हुई। इसी के चलते सालों से नामदेव समाज पूजा करता आया है और समाज यह परंपरा अभी भी निभा रहा है। लेकिन उसने सीताहरण जैसा काम किया था। इसी कारण उसकी बुराई के चलते रावण दहन भी शाम को गोधुलीबेला में समाजजन करते है। पूर्व में शहर को दशपुर के नाम से पहचाना जाता था। स्थानीय लोगों के अनुसार नामदेव समाज के लोग प्रतिमा की पूजा-अर्चना करते हैं। और मन्नतों को लेकर पैर में लच्छा भी बांधते है। इस दौरान बाद राम और रावण की सेनाएं निकलती हैं। शाम को रावण के वध से पहले लोग रावण के समक्ष खड़े रहकर क्षमा-याचना करते है। वे कहते हैं, सीता का हरण किया था, इसलिए राम की सेना आपका वध करने आई है। इसके बाद प्रतिमा स्थल पर अंधेरा छा जाता है और फिर उजाला होते ही राम की सेना उत्सव मनाने लगती है। मान्यता है कि इस प्रतिमा के पैर में धागा बांधने से बीमारी नहीं होती। यही कारण है कि अन्य अवसरों के अलावा महिलाएं दशहरे के मौके पर रावण की प्रतिमा के पैर में लच्छा बांधती हैं।
परंपरा का कर रहे निर्वहन
सालों पहले से चली आ रही परंपरा का निर्वहन नामदेव समाज आज भी करता है। नामदेव समाज के लोगों का कहना है कि हमारे पूर्वज भी पूजा करते आए है। हम भी उसी का निर्वहन कर रहे है। अच्छाईयों के लिए पूजा और बुराईयों के लिए दहन किया जाता है। पहले पुरानी प्रतिमा थी, अब नई प्रतिमा स्थापित है। शुभ मुर्हूत में पूजा के बाद शाम को गोधुलीबेला में रावण दहन किया जाता है।