
महाभारत काल में पांडवो ने अज्ञातवास के दौरान बनाया था यह अनोखा शिवधाम
मंदसौर.
हर इमारत के लिए पहले नींव तैयार होती है और आखरी में शिखर लेकिन जिले के शामगढ़ के समीप चंदवासा में ऐसा अनोखा शिवधाम है जहां पहले शिखर बना ओर आखरी में नींव का काम हुआ। महाभारत कालीन इस अनोखे शिवधाम पर शिवरात्रि को लाखों की संख्या में भक्त जुटेंगे। यहा तीन दिवसीय मेला भी वर्षों से लगता आ रहा है।
इस अनोखे शिवधाम पर मान्यताओं के कारण शिवभक्तों की आस्थाकी डोर मजबूत है। महाभारत काल के दौरान अज्ञातवास के दौरान पांडावों ने इस बनाया था। जहां आम आदमी तो ठीक सूर्य की पहली किरण भी महादेव को प्रणाम करती है। जिले में एक ऐसा शिवधाम है जो प्राचीन मान्यताओं और आस्था के कारण भक्तों के बीच अपनी अलग जगह रखता है। पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान इसका निर्माण किया ओर युधिष्ठिर को धर्मराज कहा जाता था और कहा जाता है कि तभी से इस स्थान का नाम धर्मराजेश्वर हुआ था। बौद्धस्तुप की गुफाएं और कलाकृतियां भी है। इसे ८ वीं सदी का भी बताया जाता है। इस पूरे मंदिर में एक भी जगह जोड़ नहीं है और इसे चट्टान को खोखला कर तराशा गया है। इस मंदिर से अनेक किवदंतियां भी जुड़ी है। इतना ही नहीं कहा जाता है कि इस मंदिर का सबसे ऊपर का हिस्सा शिखर का निर्माण पहले हुआ तो अंत में बनने वाली नींव का स्थान यहां पहले हुआ था। इस कारण यह अद्भुद और अकल्पनीय है।
पहाड़ी पर बना धर्मराजेश्वर अपने आप में इतिहास की गवाही दे रहा है
जिले के शामगढ़ क्षेत्र के गांव चंदवासा के निकट छोटी सी पहाड़ी पर बना धर्मराजेश्वर अपने आप में इतिहास की कहानी बयां कर रहा है। मंदिर की खासियत यह है कि यह एक चट्टान को खोखला कर तराशा गया है। मंदिर को इस तरह तराशा गया है कि पूरे मंदिर में एक भी जगह जोड़ नहीं है। इस मंदिर तक पहुचंने के लिए ९ मीटर जमीन की तह में जाना होगा। जहां मुख्य मंदिर के आसपास सात छोटे मंदिर है। मंदिर के नीचे की और आसपास सेकड़ो गुफाए है। जिनमें बोद्ध की विभन्न मुद्राओ में मुर्तिया आज भी इतिहास बयां कर रही है।
५४ मीटर लंबा, २० मीटर चौड़ा और ९ मीटर गहरा है मंदिर
लेटराइट पत्थरों से बनी चट्टान पर मंदिर और गुफाओं का निर्माण किया गया है। 54 मीटर लंबा, 20 मीटर चौड़ा और 9 मीटर की गहराई में बना यह मंदिर एक चट्टान को खोखला कर देवालय में परिवर्तित किया। मंदिर के द्वार पर मंडप, शिखर और गर्भगृह बने है जो पिरामिड आकार में है। मुख्य मंदिर के इर्दगिर्द सात और छोटे मंदिर है। वही मुख्य मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा के साथ शिवलिंग विराजित है। पिरामिड अकार के बने इस मंदिर की दीवारों पर भगवान गणेश, लक्ष्मी, पार्वती, कालका, गरुड़ जैसी कई कलाकृतिया बनी हुई है। मंदिर के बारे में कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं लेकिन इतिहासकार इसे 8 वी शताब्दी का निर्माण मानते है। इतिहासकार इसे सप्तायन शैली में बनाया गया मंदिर मानते है। ये भी बताया जता है कि इन मंदिरों को राष्ट्रकूट नरेशों ने बनवाया था। लेकिन इसमें भी इतिहासकारो की एक राय नहीं है। बताया जाता है कि धर्मराजेश्वर का यह मंदिर सुप्रसिद्ध एलोरा के कैलाश मंदिर के सामान है। इतिहासकार इन्हें रॉक कट टेम्पल के नाम से जानते है। रॉक कट का मतलब होता है पत्थर की चट्टान को तरासकर की गई कारीगरी। यह भी कहा जाता है कि इस पहाड़ी के निचले छोर पर करीब 170 छोटी बड़ी गुफाए है। हलाकि इनमें से अधिकांश गुफाए देखरेख के अभाव में ख़त्म हो चुकी है, लेकिन करीब 60 से अधिक गुफाएं अब भी मौजूद है। स्थानीय लोगो की इस मंदिर के प्रति खासी आस्था जुडी हुई है। लोगों का मानना है की इस मंदिर की आधारशिला पांडवो ने रखी थी। यहां की गुफाओ में भीम गुफा का नाम इसी लिहाज से पड़ा था।
शिवरात्रि का लग रहा है मेला
ेमहाशिवरात्रि को लेकर धर्मराजेश्वर में आस्था का मेला आयोजित होगा। इसमें यहां लाखों की संख्या में भक्त पहुंचेगे। इस अनोखे शिवधाम में शिवरात्रि पर अनेक शिवभक्त दर्शन वंदन करने के लिए पहुंचते है।
Published on:
19 Feb 2023 04:30 pm
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