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मथुरा। खारा पानी कान्हा की नगरी के लिए अभिशाप की तरह माना जाता है। लेकिन अब यही खारा पानी अब मथुरा के किसानों की तकदीर बदलेगा। जिस झींगा मछली को अभी तक साउथ एशियन देश साउथ कोरिया, थाईलैंड, चीन व जापान आदि देशों के लोग समुद्र से अपने सेवन के लिए पकड़ते हैं, वह अब मथुरा के खारे पानी में पाली जा रही है। मथुरा के मत्स्य विभाग ने इसका सफल परीक्षण किया है। इस समय 13 में से 10 स्थानों पर खारे पानी में ये पैदा की जा रही है। एक प्रोजेक्ट के तहत खारे पानी में झींगा मछली पैदा करने की शुरूआत रोहतक के सीआईएफई के साथ मथुरा में की गयी है।
किसानों की आय का जरिया बनेगी मछली
मथुरा के सहायक निदेशक (मत्स्य) डॉ. महेश चौहान बताते हैं कि झींगा मछली का सेवन कई बीमारियों में लाभप्रद होता है। ये खासकर साउथ एशियन देशों के समुद्र में पायी जाती है। इन देशों में इसका न केवल बड़ा कारोबार है बल्कि मछली के धंधे से जुड़े लोग बड़े संपन्न हैं। ये खारे पानी में पैदा होती है क्योंकि मथुरा का पानी खारा है, इसलिए यहां पहली बार इसे खारे पानी में पालने का प्रयोग किया गया, जो सफल रहा है। खारे पानी वाले इलाकों में किसान ज्यादा फसल नहीं ले पाते हैं। इसलिए अब ये रास्ता खुल गया है कि किसान खेत को तालाब बना कर उसमें मछली पैदा कर संपन्न बनें।
कितनी होगी आय
डॉ. महेश चौहान के अनुसार मथुरा में कुल 13 तालाबों में झींगा मछली का तिल के बराबर का बीज डाला गया। ये तीन महीने में 40 ग्राम तक की हो गयी है। मथुरा में गांव खायरा में वसीम के निजी तालाब में, हाथिया में खालिद के निजी तालाब में और खरौट में महेन्द्र सिंह के तालाब के सैंपल लिए गए हैं। कुल दस तालाबों में इसकी आश्चर्यजनक बढ़त हुई है। थोक में 20 ग्राम वजनी झींगा मछली का रेट 350 रुपये प्रति किलो है जबकि 30 से 40 ग्राम तक मछली का रेट 600 रुपये किलो तक है। यदि किसान अपनी गैर उपजाऊ एक हैक्टेअर जमीन में तालाब खोद कर ये पैदावार लेता है तो 15 लाख की आय होगी। इस आय में से लागत लगभग पांच लाख रुपये कम कर दें तब भी दस लाख रुपये की पैदावार होगी। वैसे मथुरा जिले में कुल 12000 हेक्टेयर ऊसर जमीन है जहां फसल पैदा नहीं होती है।
मथुरा में समुद्र जैसा खारा पानी बनाना पड़ा
झींगा मछली के लिए मस्त्य विभाग को समुद्र जैसा खारा पानी बनाना पड़ा। भूगर्भ खारे जल से पहले तालाब भरे गए। इसके बाद उसमें कैल्सियम, पोटेशियम जैसे अन्य तत्व डाले गए थे। ये गर्मी के दिनों में ही पैदा की जाती है। सर्दी में पानी में मर जाती है। होली से दीवाली के मध्य मार्च से अक्टूबर तक दो बार पैदा ला जा रही है। कई प्रकार की मछलियां सिर्फ सर्दी में समुद्र में पाली जाती हैं, वे मथुरा में पाली नहीं जा सकती।
दमा के रोग दूर करने वाली मछली अगले वर्ष से
सहायक निदेशक (मत्स्य) डा. महेश चौहान बताते हैं कि मथुरा में अगले वर्ष से सिंधी मछली का पालन होगा। यह मछली हैदराबाद में दमा के रोगियों को वैद्य खिलाते हैं। यहां के पानी में इसका प्रयोग सफल रहा है। इसके सेवन से जीवन भर एलर्जी, हार्ट की बीमारी एवं अन्य तमाम बीमारियां दूर होती हैं। यह मीठे पानी में पैदा की जाएगी। अभी तक मथुरा में रुहु, कतला, नेन, चाइलीन, सिल्वर कार (छिलके वाली) मछली पैदा की जाती रही हैं।
Published on:
25 Oct 2019 12:09 pm
