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दाऊजी मंदिर में आज कपड़ा फाड़ होली, हुरियारों पर बरसेंगे कोड़े

बलदेव में दाऊ जी का हुरंगा होता है अनूठा, 1582 से चली आ रही परंपरा, देश-विदेश से पहुंच रहे श्रद्धालु

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dauji ka huranga

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मथुरा। ब्रज की होली अपने अंतिम पड़ाव पर 22 मार्च, 2018 को दाऊजी मंदिर के प्रांगण में पहुंचेगी। लठामार, छड़ीमार, फूल होली, लड्डू होली, सांस्कृतिक होली के तमाम पड़ावों से गुजरते हुए दाऊजी मंदिर के रंगों से भरे प्रांगण में होली, होरा में तब्दील हो जाती है। यहां नंदगांव, बरसाना की तरह हुरियारिनों के हाथों में लठ नहीं होते हैं और नहीं हुरियारों के पास ढाल होती है। गोकुल की तरह हुरियारिनों के हाथों में छड़ी भी नहीं होती। मल्ल विद्या के देवता बलदाऊ के दरबार में होली का अंदाज भी अनूठा होता है। यहां हुरियारिनें हुरियारों के कपड़ों को फाड़कर उनके कोड़े बनाती हैं और इन्हीं कोड़ों की प्रेमपगी मार से हुरियारों की खबर लेती हैं।

देश और विदेश से श्रद्धालु पहुंच रहे

ब्रज के राजा दाऊजी के आंगन में अनूठे रूप में मनाई जाने बाली होली महोत्सव की परंपरा ब्रज में मनाए जा रहे होली उत्सव को शिखर का स्पर्श कराती है। अबीर, गुलाल और टेसू के फूलों से निर्मित रंग से खेले जाने बाली होली में हुरियारिनें हुरियारों के तन के कपड़ों को फाड़ बनाये गये कोड़े तड़ातड़ उन्ही पर बरसा डालती हैं। इस अनूठे प्रेम की परंपरा को देखने के लिए देश और विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदेव के उपासक

भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ की नगरी बलदेव में 22 मार्च को हुरंगा का आयोजन किया जायेगा। ब्रज की होली अन्य आयोजन भगवान श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम पर केंद्रित हैं तो दाऊजी का हुरंगा का मुख्य आकर्षण हैं। श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदेव के उपासक गोस्वामी श्रीकल्याणदेव जी के वंशज सेवायत पांडेय समाज के स्त्री पुरुष इस हुरंगा का आयोजन करते हैं।

बलदाऊ को तामपत्र लगी भांग का भोग लगाते हैं

बल्देव नगर पंचायत के चेयरमैन कमल पाण्डेय ने बताया कि हुरंगा का आकर्षण ऐसा है कि देश-विदेशों से आए भक्त इस अद्भुत नजारे को देखने मात्र से आनंदित हो जाते हैं। ब्रज के राजा बलदाऊ की प्रतिमा के समक्ष खेले जाने बाले हुरंगा से पहले उनके सेवायत ताम्र पत्र लगी भांग का भोग लगाते हैं। इसके बाद भांग के प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

बलदाऊ के विग्रह की स्थापना 1582 में हुई थी
दाऊजी मंदिर के रिसीवर आरके पांडेय बताते हैं कि बलदाऊ की नगरी बलदेव में हुरंगा की परंपरा पांच सौ साल पुरानी है। माना जाता है कि श्री बलदाऊ के विग्रह की यहां प्रतिष्ठा स्थापना 1582 में हुई थी। उनके स्थापत्य काल से बलदाऊ के हुरंगा खेलने की परंपरा पड़ी। हुरंगा को भव्य रूप देने के लिये बृहद स्तर पर तैयारियां की गई हैं। बाहर से आये श्रद्धालु एवं दर्शकों के बैठने आदि की विशेष व्यवस्था की गई है।