
मीरा बोली- जिस पानी में मछली पैदा होती है उसी पानी में मेढक भी पैदा होता है, कछुआ भी पैदा होता है। लेकिन जो प्रेम मछली जानती है वो प्रेम मेढक और कछुए नहीं जानते। मछली पानी के बिना मर जायेगी, मैं भी गिरधारी के बिना मर जाऊँगी। मेढक तो सूखे में सालों बेहोश, कोमा में पड़े रहते हैं, पर मरते नहीं, पर मछली मर जाती है। वैसे ही मैं हूँ, मैं गिरधारी बिना नहीं जी सकती। हम लोग तो कछुआ और मेढक हैं, जिनको सतगुरु से प्रेम नहीं।
भक्त तो प्रभु-प्रेम के बिना नहीं जी सकता ।
जिन खोजा नित पाईया गहरे पानी बैठ,
मै बपुरा बूड़न डरा रहा किनारे बैठ।
जिसने दूंढा उसे मिल गया। हे नाथ, मैं डरपोक किनारे बैठी रही। मुझे कुछ नहीं मिला, मीरा ने खोजा, मिल गये। जब तक ह्रदय में प्रभु को पाने की लालसा इस हद तक ना पैदा हो जाए कि उसके बिना जीना मुहाल हो, तब तक उसे या उसके प्रेम का पाने का निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिए।
सन्तमत विचार
प्रेम ही प्रभु का विधान है। तुम जीते हो ताकि तुम प्रेम करना सीख लो। तुम प्रेम करते हो ताकि तुम जीना सीख लो। मनुष्य को और कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं। प्रेम करना क्या है, सिवाय इसके कि प्रेमी प्रियतम को सदा के लिए अपने अन्दर लीन कर ले, ताकि दोनों एक हो जायें।
जिन्ह प्रेम कियो, तिन्ह ही प्रभु पायो"
प्रस्तुतिः आशीष गोस्वामी
श्री बाँके बिहारी जी मंदिर, श्री धाम वृंदावन, मथुरा
Published on:
16 Apr 2019 07:03 am
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