जिस क्षेत्र में यह मंदिर बना हुआ है उसे पुराणों में अम्बिका वन बताया गया है। इसलिए इसे अंबिका देवी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि कृष्ण, बलदेव, नन्द, यशोदा देवी और अन्य गोपों के साथ देवयात्रा के उपलक्ष्य में अम्बिका वन में उपस्थित हुए थे। वहां सब के साथ पवित्र सरस्वती के जल में स्नान कर पशुपति गोकर्ण महादेव की पूजा अर्चना की। रात्रि में सबके साथ वहीं निवास किया। उसी रात को एक विशाल अजगर ने नन्द बाबा को जकड़ लिया और उनको निगलने लगा तो सभी ने उन्हें बचाने की चेष्टा की किन्तु सभी असफल हो गये। उस समय नन्द बाबा ने कृष्ण को पुकारा। ज्यों ही कृष्ण ने अपने पैरों से उसे स्पर्श किया, अजगर ने अपना विशाल सर्प शरीर त्यागकर सुन्दर विद्याधर के रूप में खड़े होकर श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। श्रीकृष्ण के द्वारा पूछे जाने पर उसने अपना परिचय बताया कि पहले मैं सुदर्शन नाम का विद्याधर था। मैंने कभी विमान से विचरण करते समय अग्ङीरस नामक कुरुप ऋषियों को देखकर उनका उपहास किया था। जिससे उन्होंने मुझे सर्प योनि ग्रहण करने का अभिशाप दिया। आज वहीं अभिशाप मेरे लिए वरदान सिद्ध हुआ। मैं आपके चरण कमलों के स्पर्श से शापमुक्त ही नहीं, बल्कि परम कृतार्थ हो गया।