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जानिए, कहां स्थित है श्रीकृष्ण की कुल देवी का मंदिर

विजयदशमी के दिन राम लक्ष्मण के स्वरूप भी यहां पूजा–अर्चना के बाद रावण वध लीला के लिए जाते हैं।

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Mukesh Kumar

Dec 24, 2016

Mahavidya mandir

Mahavidya mandir

मथुरा।
भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा में चारों दिशाओं में मंदिर हैं। इनमें एक महाविद्या देवी का मंदिर है। पश्चिम दिशा में विशाल रामलीला मैदान के निकट एक पहाड़ीनुमा ऊंचे टीले पर स्थित ये भव्य मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है। जिसकी प्राचीनकाल से मान्यता है। महाविद्या देवी को जीवनदायिनी भी कहा जाता है।


नंद बाबा की कुल देवी हैं महाविद्या

मंदिर सेवायत गम्बो चतुर्वेदी ने बताया कि श्रीमद भागवत गीता, गर्ग संहिता, भृगु संहिता और देवी पुराणों के उल्लेख के अनुसार द्धापर युग में भी शक्ति उपासना का प्रचलन था। यह महाविद्या देवी नंद बाबा की कुल देवी थी। यहां श्रीकृष्ण का मुंडन हुआ था। विजयदशमी के दिन राम लक्ष्मण के स्वरूप यहां पूजा–अर्चना के बाद रावण वध लीला के लिए जाते हैं। बताया जाता है कि वर्तमान में जो मंदिर है उसकी स्थापना मराठों ने कराई थी। जिसका जीर्णाद्धार तांत्रिक शीलचन्द्र द्वारा सम्वत 1907 में देवी की प्रतिमा प्रतिष्ठित करके कराया गया था।


ये कथा है प्रचलित

जिस क्षेत्र में यह मंदिर बना हुआ है उसे पुराणों में अम्बिका वन बताया गया है। इसलिए इसे अंबिका देवी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि कृष्ण, बलदेव, नन्द, यशोदा देवी और अन्य गोपों के साथ देवयात्रा के उपलक्ष्य में अम्बिका वन में उपस्थित हुए थे। वहां सब के साथ पवित्र सरस्वती के जल में स्नान कर पशुपति गोकर्ण महादेव की पूजा अर्चना की। रात्रि में सबके साथ वहीं निवास किया। उसी रात को एक विशाल अजगर ने नन्द बाबा को जकड़ लिया और उनको निगलने लगा तो सभी ने उन्हें बचाने की चेष्टा की किन्तु सभी असफल हो गये। उस समय नन्द बाबा ने कृष्ण को पुकारा। ज्यों ही कृष्ण ने अपने पैरों से उसे स्पर्श किया, अजगर ने अपना विशाल सर्प शरीर त्यागकर सुन्दर विद्याधर के रूप में खड़े होकर श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। श्रीकृष्ण के द्वारा पूछे जाने पर उसने अपना परिचय बताया कि पहले मैं सुदर्शन नाम का विद्याधर था। मैंने कभी विमान से विचरण करते समय अग्ङीरस नामक कुरुप ऋषियों को देखकर उनका उपहास किया था। जिससे उन्होंने मुझे सर्प योनि ग्रहण करने का अभिशाप दिया। आज वहीं अभिशाप मेरे लिए वरदान सिद्ध हुआ। मैं आपके चरण कमलों के स्पर्श से शापमुक्त ही नहीं, बल्कि परम कृतार्थ हो गया।



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