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श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद मामले में मथुरा के कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित, अब 19 मई को आएगा निर्णय, जानिए क्या है विवाद

लखनऊ निवासी अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री ने वाद दायर कर श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर से शाही मस्जिद ईदगाह को हटाकर पूरी 13.37 एकड़ जमीन श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट को सौंपने की मांग की है। गुरुवार को इस मामले में अदालत में करीब दो घंटे तक सुनवाई की गई। इस दौरान शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी के सचिव तनवीर अहमद भी मौजूद रहे।  

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मथुरा

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Amit Tiwari

May 05, 2022

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उत्तर प्रदेश के मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद मामले में मथुरा के कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है। अदालत अब 19 मई को अपना फैसला सुनाएगी। मथुरा की एक अदालत में श्रीकृष्ण जन्मभूमि की 13.37 एकड़ भूमि के स्वामित्व की मांग को लेकर याचिका दाखिल की गई है, जिसमें श्रीकृष्ण जन्मभूमि में बनी शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की भी मांग की गई है।

खुदाई करवाने की है मांग

याचिका में अदालत की देखरेख में विवादित जगह की खुदाई करवाने की मांग भी गई है। याचिकाकर्ता ने कहा कि खुदाई की एक जांच रिपोर्ट पेश की जाए। साथ ही यह भी दावा किया गया है कि जिस जगह पर मस्जिद बनाई गई थी, उसी जगह पर कारागार मौजूद है, जहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। अगर खुदाई कराई जाएगी तो यह बात साबित हो जाएगी।

13.37 एकड़ जमीन ट्रस्ट को सौंपी जाए

श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद को लेकर लखनऊ निवासी अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री की ओऱ से वाद दायर किया गया है। दायर वाद में जन्मस्थान परिसर से शादी मस्जिद ईदगाह को हटाने और पूरी 13.37 एकड़ जमीन को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट को सौंपने की भी मांग की है। इस मामले को लेकर गुरुवार को तकरीबन दो घंटे तक सुनवाई चलती रही। इस बीच शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी के सचिव तनवीर अहमद की मौजूदगी भी वहां पर देखी गई।

संस्थान को समझौता करने का अधिकार नहीं

वादी पक्ष की ओर से कहा गया कि शाही मस्जिद कमेटी से श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के द्वारा 1968 में समझौता किया गया था। जबकि इस मामले में संस्थान को समझौता करने का कोई भी अधिकार ही नहीं है। लिहाजा यह समझौता रद्द कर पूरी की पूरी जमीन को ट्रस्ट को सौंप दिया जाए।

यह वाद चलने योग्य ही नहीं है

वहीं मामले में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से अधिवक्ता जीपी निगम ने कहा है कि यह वाद चलने योग्य ही नहीं है। अदालत में वादी को वाद के रूप में रिवीजन नहीं दाखिल करना था। बल्कि अपील दाखिल करनी थी। इस मामले में पहले अपील दाखिल की गई फिर उसे रिवीजन में कन्वर्ट किया गया। यह बिल्कुल भी न्यायसंगत नहीं है।