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मथुरा। सैकड़ों वर्षों से हस्तलिपि और पांडुलिपियों के साथ-साथ प्राचीन सिक्के भी ब्रज संस्कृति शोध संस्थान में आपको देखने को मिल जाएंगे। कई राज्यों से शोधकर्ता यहां आते हैं। प्राचीन और मुगलकाल की वस्तुओं पर शोध करने के लिए साक्ष्यों को यहां से जुटाते हैं। बृज संस्कृति शोध संस्थान ((Brij Culture research Institute) ) ने श्रीभागवत संग्रहालय एवं ग्रंथागार ( Shri Bhagvat Museum And Library) की स्थापना की है। इसमें 18वीं सदी की हस्तलिपि और पांडुलिपि अभी मौजूद हैं। संस्थान में करीब 3000 हस्तलिखित पांडुलिपियां रखी हुई है, जो अलग-अलग भाषा में हैं। हजारों की संख्या में दुर्लभ सिक्के हैं, जो प्राचीन समय की याद तरोताजा करते हैं। बृज संस्कृति शोध संस्थान का लोकप्रिय नाम वृंदावन शोध संस्थान है।
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विलुप्त होती धरोहरों को बचा रहा संस्थान
समय के साथ-साथ लिखने का और यादों को संजोकर रखने का तरीका भी बदल रहा है। प्राचीन समय में लोग हस्तलिपि और पांडुलिपि के जरिए अपनी बातों को लिखा करते थे और उन्हें संभाल कर रखा करते थे। जैसे-जैसे दौर गुजरता गया और जमाना भी हाईटेक होता गया। हाईटेक होते इस जमाने में लोग अपनी धरोहरों को भूलते जा रहे हैं और यह धरोहर विलुप्त होने की कगार पर हैं। वृंदावन के गोदा विहार स्थित बृज संस्कृति शोध संस्थान प्राचीन धरोहरों को बचाने में अपना अहम योगदान दे रहा है। पत्रिका टीम गोदा विहार स्थित ब्रज संस्कृति शोध संस्थान पहुंची और यहां पहुंचने के बाद संस्थान में रखी प्राचीन चीजों और हस्तलिपि और पांडुलिपियों के बारे में जानकारी एकत्रित की। टीम को यहां पर 16वीं शताब्दी से लेकर 18 वीं शताब्दी तक की हस्तलिपि और पांडुलिपि देखने को मिली। वहीं कुछ ताम्रपत्र और दुर्लभ सिक्के भी संस्थान में टीम ने देखे।
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3 हजार हस्तलिखित पुस्तकें
पत्रिका टीम ने ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के प्रकाशन अधिकारी गोपाल शरण शर्मा से जब यहां की धरोहरों के बारे में जाना तो उन्होंने बताया कि हर महीने कोई ना कोई हस्तलिपि और पांडुलिपि यहां आती रहती है। उन्होंने बताया कि संस्थान में 3 हजार हस्तलिखित ऐसी पुस्तकें हैं जो अलग-अलग भाषाओं में हैं। 1500 हस्तलिखित जो पांडुलिपियां संस्कृत भाषा में है। 1000 ब्रजभाषा में है, 10 गुजराती भाषा में है और बांग्ला के साथ-साथ अन्य भाषाओं की हस्तलिखित पुस्तकें यहां रखी हुई हैं।
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मुगल साम्राज्य से संबंधित पुस्तकें
शर्मा बताते हैं कलात्मक चित्र भी यहां मौजूद हैं। विक्रम संवत 1685 में कालिदास द्वारा रचित अभिज्ञान शाकुंतलम, अष्टछाप के कवि कृष्णदास की लिखी हस्तलिखित पुस्तक भी हमारे पास है। उन्होंने बताया कि 16 वीं शताब्दी के अकलनामा का विवरण इस हस्तलिखित पुस्तक में है। गोपाल शरण ने बताया कि राधा रमण मंदिर के गोस्वामी के विवाह का विवरण हस्तलिखित पांडुलिपियों में हमारे पास मौजूद है।
18वीं शताब्दी का राधाकुंड का नक्शा
प्राचीन समय राधा कुंड जैसा हुआ करता था, उसका नक्शा आज भी बृज संस्कृति शोध संस्थान में मौजूद है। यह नक्शा 18 वीं शताब्दी का है। यह जो भी शोधकर्ता आता है कुछ ना कुछ यहां से पाकर जाता है।
रामधारी सिंह दिनकर की पांडुलिपि
रामधारी दिनकर जी द्वारा लिखी हुई 5 हस्तलिपियां मौजूद हैं। बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा जो पुस्तकें लिखी गई, उनमें से 150 हैं । वृंदावनदास वर्मा के द्वारा हस्तलिखित पांच पुस्तकें यहां देखी जा सकती हैं। इनके अलावा शरण बिहारी की तीन और उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल विष्णु कांत शास्त्री की हस्तलिखित पांडुलिपि मौजूद है।
Published on:
28 Dec 2019 01:50 pm
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