
वृन्दावन कुम्भ मेले में आसमान में लहराता ध्वज - फ़ोटो - पत्रिका न्यूज़ नेटवर्क
पत्रिका न्यूज़ नेटवर्क
मथुरा. बसंत पंचमी पर मंगलावर को तीनों अनि अखाड़ों ने श्रीमहंतों और अन्य संतों की मौजूदगी में अपने अपने अखाड़ों की ध्वजा का रोहण किया जिसके साथ ही वृंदावन में यमुना किनारे कुम्भ को शुरुआत हो गई। ध्वजारोहण से पहले शाही शोभायात्रा निकाली गई जिसमें ठाकुर जी का डोला, संत, महंत, महामंडलेश्वर और भक्तों की टोलियां भी शामिल हुईं। राजशाही परंपरा के तहत यह शोभायात्रा निकली।
बता दें कि यमुना तट पर यह 12 बरस में एक बार बसंत पंचमी से यमुना किनारे कुम्भ का आयोजन किया जाता है। मान्यता है कि वृंदावन राधा-कृष्ण के प्रेम की भूमि है। यहां रसिक भाव से वैष्णव मत के साधु संत अपने अराध्य की पूजा अर्चना करते हैं। वृंदावन में इस वैष्णव कुंभ में शैव (नागा) संन्यासी नहीं आते हैं। बसंत पंचमी को धार्मिक अनुष्ठान के साथ यमुना किनारे ध्वजारोहण का कार्यक्रम हुआ जिसमें तीनों अनि अखाड़ों में ध्वजा रोहण किया। ध्वजा रोहण में निर्वाणी अनी अखाड़ा के श्रीमहंत धर्मदास, दिगंबर अनी अखाड़ा के श्रीमहंत कृष्णदास, निर्मोही अनी अखाड़ा के श्रीमहंत राजेंद्रदास के साथ ही अन्य साधु संत भी मौजूद रहे।ध्वजारोहण के बाद यमुना किनारे कुम्भ को शुरुआत हो गई है और यहां 28 मार्च तक कुम्भ का आयोजन चलेगा।
वृंदावन कुम्भ के बारे में कोई सटीक प्रमाण तो नहीं हैं लेकिन मान्यता है कि जब समुद्र मंथन हुआ, तब उसमें से निकले अमृत कलश को लेकर गरुड़ जी चले। गरुड़ भगवान अमृत कलश को लेकर जब वृंदावन पहुंचे, तब उन्होंने यमुना किनारे कदंब वृक्ष पर उस अमृत कलश को रख दिया और विश्राम करने लगे। यहां विश्राम करने के बाद गरुड़ भगवान उस कलश को लेकर नासिक, उज्जैन, प्रयागराज, हरिद्वार गए। जहां अमृत कलश से बूंद छलकने के कारण वहां कुंभ लगने लगा और वृंदावन में उनके विश्राम करने के बाद यहां इस आयोजन की परंपरा शुरू हुई।
By - Nirmal Rajpoot
Published on:
16 Feb 2021 02:38 pm
