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मथुरा के गोवर्धन से जुड़ी है श्रीनाथजी के मंदिर की ये प्रथा, उत्थापन के दर्शन से पहले इसलिए किया जाता है शंखनाद

जानिए नाथद्वारा में उत्थापन के दर्शन के कुछ देर पहले ही शंखनाद क्यों होता है।

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shrinath ji

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मथुरा। यह बात तब की है जब श्रीनाथ जी मेवाड़ पधारने से पहले गोवर्धन में गिरिराज पर विराजते थे। एक दिन श्रीनाथजी श्याम ढाक पर बैठकर मुरली बजा रहे थे और गोविंदस्वामी जी दूर से ये दृश्य देख रहे थे। उस समय उत्थापन के दर्शन का समय था, तब श्रीनाथ जी ने देखा कि गुसाईं जी मन्दिर की ओर उत्थपन के दर्शन खोलने जा रहे हैं तो श्रीनाथ जी उपर से कूदकर दौड़ कर भागे। इस बीच उनके वागा के दामन का एक टुकड़ा झाड़ पर उलझकर वहीं लटका रह गया। वे मंदिर में जाकर खड़े हो गए। गुसाईं जी ने जब दर्शन खोले तो देखा कि श्रीनाथ जी का दुपट्टा फटा हुआ है। उन्होंने भितरिया से पूछा कोई घुसा है क्या मन्दिर में? तो सबने कहा नहीं महाराज कोई कैसे आ सकता है, कोई नहीं आया।

तब तब गोविन्द स्वामी बाहर से बोले ये तो वहां खेलते खेलते बंसी बजा रहे थे, विश्वास ना हो तो आकर देखलो। इनके दुपट्टे का टुकड़ा वहीं लटका है। जब गुसाईं जी ने वहां जाकर देखा तो टुकड़ा वहीं था। तब पुनः आकर श्रीनाथ जी से पूछा इतना उतावलापन क्यों किया। तब श्रीनाथ जी ने कहा कि मैं तो वहा बैठा था। आपको स्नान करके मन्दिर आते देखा तो दौड़ पड़ा। वहीं गिरते गिरते रह गया और दुपट्टा का टुकड़ा वहीं रह गया। तब तब से गुसाईं जी ने ऐसी व्यवस्था कर दी कि तीन बार घंटा बजाने, तीन बार शंखनाद कर और कुछ देर रुककर ठाकुरजी का द्वार खोला जाए ताकि बजाकर ओर कुछ देर रुक कर ठाकुर जी का किवाड़ खोला जाए ताकि ठाकुर जी जहां कहीं भी हों, आराम से आ सकें। इसी कारण आज भी नाथद्वारा में उत्थापन के दर्शन के कुछ देर पहले ही शंखनाद होता है, फिर दर्शन खोले जाते हैं।