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कुछ अलग हटकर हैं UP Police की ये महिला थानेदार, जानिए क्या करती हैं

- तीन दर्जन से अधिक पारिवारिक विवादों में कराया समझौता -पुलिस अधिकारी के साथ बेहतर काउंसलर भी हो रहीं साबित -एसएचओ वृंदावन ने विकलांगों की मदद को निकाला पर्स

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up police

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मथुरा। इन पुलिसकर्मियों को लीक से हट कर सांस लेने की आदत है। पुलिस का रौब, सख्त मिजाज और बातबात पर मुहं पर रखी गाली इनकी पहचान नहीं है। इंसानियत और सामाजिक समझ इनकी खासियत बन गई है। महिला थाना अध्यक्ष उपासना सिंह जितनी अच्छी पुलिस अधिकारी हैं उतनी ही बेहतर परिवारिक काउंसलर भी साबित हो रही हैं। वह अपनी सूझबूझ से ही थाने में आने वाले पारिवारिक विवादों में करीब आधे विवादों को न्यायालय तक पहुंचने से पहले ही दोनों पक्षों को बिठाकार आपसी सहमति से निपटाने में कामयाब हो रही हैं। उनकी यह सूझबूझ, लोगों के साथ सौम्य और विश्वास भरा व्यवहार महिला थाने की छवि बदलने में कामयाब हुआ है। विभाग में भी उनकी कार्यशैली की प्रशंसा हो रही है तो वादी और प्रतिवादी भी समझौते के बाद धन्वाद देकर लौट रहे हैं।

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महिला पक्ष को सुरक्षा का भरोसा

महिला थानाध्यक्ष उपासना सिंह ने बताया कि अक्टूबर महीने में महिला थाने में पारिवारिक विवाद के 118 प्रार्थनापत्र आये। जिनमें से 35 विवादों में समझौता करा दिया गया। जबकि 30 मामले निरस्त कर दिये गये। 18 मामलों में मुकदमा दर्ज करा दिया गया। 35 मामले अभी लम्बित हैं। उन्होंने बताया कि वह दोनों पक्षों को पहले पूरी तरह से सुनती हैं। इसके बाद समय देती हैं। पारिवारिक विवादों में आपसी समझ बेहद महत्वपूर्ण होती है। महिला पक्ष को भी सुरक्षा का पूरा भरोसा होता है तभी उनका आत्मविश्वास लौटता है, यह आत्मविश्वास ही परिवारों को जोड़ने का काम करता है।

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विकलांगों की मदद के बाद ’ड्यूटी’
अच्छी पुलिसिंग का दूसरा जीता जागता उदाहरण दो दिन पहले देखने को मिला। अचानक वीआईपी ड्यूटी की सूचना पर एसएचओ वृन्दावन संजीव कुमार दुबे मय हमराह थाने से निकलकर सीएफसी चौराहा होते हुये बांके बिहारी मंदिर जा रहे थे। समय का अभाव था, वीआईपी के आने का समय नजदीक था। सीएफसी चौराहे के निकट एसएचओ की निगाह यकायक दो दिव्यांगों पर पड़ी। उन्होंने फौरन ड्राइवर को गाड़ी रोकने का संकेत दिया। गाड़ी रुकते ही वह दिव्यांगों के समीप पहुंचे। हमराह हतप्रभ थे, कुछ समझ ही नहीं पाये कि आखिर हुआ क्या? थाना प्रभारी ने जब दिव्यांगों से पूछा कहां जाना है, तब जानकारी हुई कि दोनों दिव्यांग शाहजी मन्दिर जाना चाहते हैं, लेकिन कोई रिक्शा चालक उन्हें ले जाने को तैयार नहीं हो रहा। संजीव कुमार दुबे ने दिव्यागों को पकड़कर पहले रोड पार करवाया फिर एक ई-रिक्शा रुकवाकर दोनों को बैठाया और पर्स निकालकर चालक को उसका मेहनताना देकर कहा कि इन्हें शाहजी मन्दिर छोड़ देना।

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