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यूपी में हुआ महागठबंधन तो इस बाहुबली की बढ़ेगी टेंशन, बेटे को नहीं लड़ा पायेंगे चुनाव

गठबंधन को लेकर परेशान है इस बाहुबली का परिवार

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मऊ

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Sarweshwari Mishra

Dec 27, 2018

Bahubali Mukhtar Ansari

Bahubali Mukhtar Ansari

वाराणसी. 2019 लोकसभा चुनाव जैसे -जैसे नजदीक आता दिख रहा है वैसे ही सभी राजनीतिक दलों की सरगर्मी तेज होती जा रही है। वहीं गठबंधन को लेकर चर्चा जोरों पर है जिसका असर अंसारी बंधुओं पर पड़ता नजर आ रहा है। मुख्तार अंसारी भाई के साथ बेटे को भी संसद भेजना चाहते है लेकिन गठबंधन के कारण इनके पास विकल्प ही नहीं बच रहा है। अगर परिवार के लोग दूसरी पार्टी में जाते हैं तो बसपा में मुख्तार के भविष्य पर संकट खड़ा होगा और नहीं जाते है तो इनका चुनाव लड़ने का सपना टूट जाएगा।

बता दें कि मुख्तार अंसारी का पूर्वांचल में मऊ, गाजीपुर, आजमगढ़, वाराणसी सहित कई जिलों में अपना जनाधार है। कौमी एकता दल के गठन के बाद मुख्तार परिवार ने पूर्वांचल ही नहीं बल्की यूपी में अपना अच्छा संगठन खड़ा कर लिया था लेकिन वर्ष 2016 में कौमी एकता दल का सपा में विलय और फिर निष्कासन के बाद स्थितियां काफी बदल गयी हैं। वर्ष 2017 विधानसभा चुनाव से पहले बाहुबली मुख्तार को बसपा मुखिया मायावती ने न केवल सहारा दिया बल्कि उन्हें मऊ और उनके पुत्र अब्बास अंसारी को घोसी से चुनाव लड़ाया। यह अलग बात है कि बीजेपी की लहर में अब्बास को हार का सामना करना पड़ा था।

माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव में बसपा अब्बास को घोसी या आजमगढ़ तथा अफजाल को गाजीपुर से टिकट देगी। कारण कि इनके मैदान में आने के बाद बसपा के जीत का चंास बढ़ जाता। अब्बास अंसारी तो लगातार दोनों लोकसभा क्षेत्रों में अपनी पैठ भी बनानी शुरू कर दिये थे लेकिन अब अगर सपा और बसपा के बीच गठबंधन होता है तो मुख्तार परिवार की परेशानी बढ़ेगी। कारण कि गाजीपुर सीट पर सपा का दावा मजबूत है और घोसी सीट भी वह बसपा को देने के मूड में नहीं दिख रही है। सूत्रों की माने तो गठबंधन में आजमगढ़, घोसी और गाजीपुर सीट छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। कारण कि घोसी सीट का बड़ा हिस्सा बलिया में आता है। बलिया की एक सीट पर पहले से ही बसपा दावा कर रही है। ऐसे में मुख्तार परिवार के सदस्यों को टिकट मिलना मुश्किल लग रहा है। चर्चा इस बात की भी है परिवार के कुछ सदस्य शिवपाल के संपर्क में है लेकिन खुलकर बात नहीं कर रहे हैं कारण कि उन्हें डर है कि कहीं इसका असर मुख्तार के राजनीतिक कैरियर पर न पड़े। ऐसे में स्थिति काफी दिलचस्प हो गयी है।