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Ahoi Ashtami 2020: 258 साल बाद अहोई अष्टमी पर बन रहा है पंच महायोग, जानिए इसका महत्व

Highlights: -8 नवंबर को मनाया जाएगा अहोई अष्टमी व्रत -शाम को 5:26 से 6:46 तक है पूजा का शुभ मुहूर्त -देव चंद्रमा भी अपनी स्वयं की राशि में विराजमान

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मेरठ

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Rahul Chauhan

Nov 06, 2020

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पत्रिका न्यूज नेटवर्क

मेरठ। कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को संतान सुख व संतान हित में किया जाता है। यह विशेष व्रत सभी आस्थावान माताओं द्वारा। इस अहोई अष्टमी पर सूर्योदिनी अष्टमी यानी 8 नवम्बर को नवमी तिथि क्षय है। पंडित भारत ज्ञान भूषण ने बताया कि चाँद-तारों से सम्बंधित पर्व होने के कारण संध्या व रात्रि व्यापिनी तिथि ही मान्य होगी जो कि रविवार आठ नवम्बर प्रातः7:32 बजे से प्रारम्भ होकर अगले दिन सुबह 6:52 तक रहेगी। जिसमें बव व बाल व करण तथा पुष्य व आश्लेषा नक्षत्र विराजमान होंगे।

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सबसे महत्वपूर्ण है कि 258 साल बाद रवि योग, रविपुष्य योग, सर्वार्थसिद्धियोग, राजयोग व शुक्लयोग जैसे पांच योगों से मिलकर पंच महयोगों से सुसज्जित होकर अहोई माता अष्टमी में आ रही हैं। इस कारण से यह इस बार अहोई अष्टमी और अधिक विशेष हो जाती है। पूज्य देव चन्द्रमा स्वयं अपनी कर्क राशि में तिथि के प्रारम्भ में ही गोचर में होंगे ये सब अत्यंत ही शुभकारी कल्याणकारी योग संतान की खुशियों स्वास्थ्य आयु सफलता यश प्रतिष्ठा के लिए बन रहे है।

शुभ मुहूर्त : शाम 5:26 से 7:28 बजे तक

शुभतम मुहूर्त : शाम 6:06 बजे से 6:46 बजे तक

ऐसे करें अहोई पूजन

अहोई माता को पूर्वोत्तर दिशा में, अष्टकोणीय रूप में स्थापित कर, उनके नीचे सात बच्चों के प्रतीक बनाकर, हथेली में सात गेहूं के दाने लेकर अहोई माता की कहानी कहें व सुनें। कथा से पूर्व जल के लोटे पर रोली से स्वास्तिक बनाकर कलावा बांधें तथा अन्य पात्र में मीठे गुलगुले या हलुआ व दक्षिणा आदि रखकर आचमनी के रूप में जल के छींटे दें तथा आरती पश्चात गुड़ का भोग अवश्य लगाएं। छोटी लाल चुनरी अहोई माता को भेंट करें तथा लाल चुनरी स्वयं पहनकर सासु माँ या प्रौढ़ा को सम्मानपूर्वक बायना दक्षिणा सहित प्रदान करें तथा अपनी संतान के लिए आशीर्वाद प्राप्त करें तथा अहोई माता से संतान का जीवन सफल व सार्थक हो ऐसा वरदान पाएं। मान्यता अनुसार पूजा में रखे जल पात्र से तारों को जल चढाने के बाद ही व्रत खोलें।

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गर्भवती व रोगी महिलाएं व्रत में उदारता बरतें

शास्त्रों में भी ऐसी महिलाओं के लिए निर्जला व निराहार व्रत न करने की छूट दी हुई है ताकि गर्भस्थ शिशु पर या रोगी महिला पर विपरीत प्रभाव न पड़े इसीलिए फलाहार दुग्दाहार आवश्यकता अनुसार अवश्य लेलेना चाहिए ताकि स्वस्थ जीवन ही मंगलता का प्रतीक हो सके।