Mission 2019: महागठबंधन से निपटने के लिए भाजपा ने तैयार किया उत्तर प्रदेश में ये फार्मूला, देखें वीडियो

लोक सभा चुनाव 2014 के मुकाबले इस बार बढ़ सकती हैं मुश्किलें

 

By: sanjay sharma

Published: 19 Jan 2019, 01:58 PM IST

केपी त्रिपाठी, मेरठ। कहते हैं कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता उप्र से होकर जाता है। यह सत्य भी है। केंद्र में सरकारें चाहे कांग्रेस की रही हो या फिर भाजपा की। जिसने उप्र जीता उसी दल के सिर सेहरा बंधा। वर्ष 2014 में विपक्ष के बिखराव का लाभ उठाने वाली भाजपा के लिए 2019 में विपक्ष की एकता से पार पाना मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि उप्र में भी पश्चिम जिस भी दल ने जीता उसी की सरकार केंद्र और प्रदेश में बनी है। कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा सभी दलों को पश्चिम उप्र ने बराबर मौका दिया। इसी मौके को साधने के लिए फिर से दल पश्चिम में अपनी जड़ें मजबूत करने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि यूपी में 2014 के मुकाबले अगर 2019 के चुनाव में पार्टी को ज्यादा नुकसान हुआ तो उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं, इसलिए बीजेपी यूपी जीतने के लिए सभी हथकंडे अपनाने से भी परहेज नहीं करेगी। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के चुनाव से पहले गठबंधन के ऐलान से भाजपा की यूपी जीत का फार्मूला बिखरता दिख रहा है। भाजपा पिछले आम चुनाव में यूपी की 80 सीटों में से 71 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। इनमें से दो सांसद अपना दल के थे। हालांकि बाद में हुए लोकसभा उपचुनाव में विपक्षी दलों की एकता और उनके गठबंधन के कारण भाजपा को गोरखपुर और फूलपुर और कैराना जैसी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन इसके बावजूद उसके पास 68 सीटें बची हुई है।

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राह मुश्किल तो नई रणनीति पर विचार

यूपी में प्रमुख विपक्षी दल के एक साथ आने से भाजपा को अपनी राह मुश्किल नजर आ रही है। इसलिए पार्टी नई रणनीति पर विचार कर रही है। उत्तर प्रदेश में अनुप्रिया पटेल की अपना दल और ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी अभी भाजपा से नाराज चल रही है। लिहाजा ऐसी परिस्थिति में भाजपा राज्य में अन्य दलों जैसे अजीत सिंह राष्ट्रीय लोकदल, निषाद पार्टी, महान दल के साथ ही अन्य दलों के संपर्क में हैं।

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नाराज नेताओं को साधने की जुगलबंदी

समाजवादी पार्टी और बसपा का गठबंधन भले ही हो गया हो। लेकिन इसके बाद भी दोनों की राहें गठबंधन में आसान नहीं दिखाई देती। यहीं कारण है कि अब भाजपा की निगाहें उन नेताओं पर टिकी हैं जो कि चुनाव लड़ने की तैयारी में थे और सपा-बसपा गठबंधन के बाद उन नेताओं की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। भाजपा दोनों दलों के ऐसे नेताओं से संपर्क साधने में लगी है जो अपनी पार्टी से नाराज हैं और अपने लोकसभा क्षेत्र में भाजपा को जीत दिला सकते हैं। महान दल और निषाद पार्टी के नेताओं से कहा गया है कि उनकी पार्टी को लोकसभा में सीट नहीं मिलेगी लेकिन उनके मनपसंद उम्मीदवारों को पार्टी की तरफ से एक-दो सीटों पर टिकट दिया जा सकता है। पिछले दिनों से जिस तरह से अनुप्रिया पटेल के अपना दल और ओमप्रकाश राजभर की सोहेल देव भारतीय समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और प्रदेश बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोला है। इसको ध्यान में रखते हुए बीजेपी नेतृत्व अन्य छोटे दलों से बातचीत करने में लगा है।

जातियों और समाजिक संगठनों को साधने की जुगत

भाजपा उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जातियों के सामाजिक संगठनों के नेताओं को भी साधने की जुगत में है। इनसे भाजपा अपने पक्ष में प्रचार करने की अपील भी करेगी। भाजपा को लोकसभा चुनाव 2014 में उत्तर प्रदेश में 71 सीटों पर कब्जा जमाने में कामयाब रही थी।

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पश्चिम जीता तो सब जीता

पश्चिम उप्र जीता तो सब जीता। यह बात सभी दल जानते हैं। क्योकि जीत की नीव इसी क्षेत्र से पड़ती है। प्रदेश हो या देश जिस दल की भी सरकारें रही। उसका दबदबा पश्चिम उप्र में कायम रहा। बसपा ने पश्चिम उप्र जीता तो बसपा की सरकार पूरे दमखम के साथ उप्र में बनी। ठीक ऐसे ही 2012 में समाजवादी पार्टी ने पश्चिम उप्र की 15 विधानसभा सीटों पर कब्जा किया तो उसकी सरकार सूबे में पूरे बहुमत से बनी। ठीक ऐसे ही 2017 में भाजपा के साथ हुआ। पश्चिम उप्र में भाजपा को 38 सीटों का लाभ मिला। नतीजतन उप्र में भाजपा की सरकार।

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