यूपी का एक शहर ऐसा भी, जहां इस खूबसूरत अभिनेत्री को लोग नहीं पसंद करते!

यूपी का एक शहर ऐसा भी, जहां इस खूबसूरत अभिनेत्री को लोग नहीं पसंद करते!

शुरू से लेकर अब तक एक बड़े धड़े को नगमा खलनायिका की तरह दिखी हैं

संजय शर्मा, मेरठ। 'इस जहां की नहीं हैं तुम्हारी आंखें', 'गोरे-गोरे मुखड़े पर काला काला चश्मा', 'आखिर तुम्हें आना है जरा देर लगेगी...जैसे कर्इ सुपरहिट गाने लोगों की जुबान पर आज भी चढ़े हुए हैं। ये गाने ही नहीं, बल्कि लंबी फेहरिस्त है उन फिल्मों की, जिनसे अभिनेत्री नगमा ने लोगों के दिल पर राज किया। अभिनय आैर खूबसूरती को लेकर नगमा हमेशा चर्चा में रही हैं। पहली फिल्म 'बागी' सलमान खान के साथ 16 साल की उम्र में करने के बाद यह बिंदास अभिनेत्री दक्षिण भारतीय फिल्मों की सुपरस्टार बन गर्इ। नगमा ने 1990 से लेकर 2009 तक कुल मिलाकर 68 फिल्मों में काम किया।

नगमा को नौ भाषाएं हिन्दी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, भोजपुरी, पंजाबी आैर मराठी आती हैं आैर इन भाषायी फिल्मों में अपनी अभिनय क्षमता का जबरदस्त परिचय दिया। हिन्दी फिल्मों में अपने जमाने में वह खास मुकाम पर रही। यानि देशभर में नगमा के चाहने वालों की संख्या चरम पर पहुंच गर्इ। यही वजह रही कि राजनीति में ग्लैमर आैर अपनी टिप्पणियों के दम पर जल्द उन्होंने अपना सिक्का जमा लिया।

2014 में मेरठ से प्रत्याशी

लोकसभा 2014 में नगमा के मेरठ-हापुड़ सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जैसे घोषणा हुर्इ तो मेरठ में हर कोर्इ उछल पड़ा। उनके पहले रोड शो से लेकर हर चुनावी व गैर चुनावी कार्यक्रम में भीड़ उमड़ पड़ती थी। हालांकि वोटों के गणित में वह पीछे ही रही आैर चुनाव हार गर्इ, लेकिन चुनाव में सबसे लोकप्रिय प्रत्याशी रहीं।

पार्टी गुटबाजी से बदली तस्वीर

फिल्म अभिनेत्री लोगों की तो चहेती बनी हुर्इ हैं, लेकिन कांग्रेस की गुटबाजी इस कदर हावी है कि शुरू से लेकर अब तक एक बड़े धड़े को नगमा खलनायिका की तरह दिखी है। दिल्ली पार्टी हार्इकमान का आदेश है तो स्थानीय पार्टी नेता चुप रहते हैं, लेकिन नगमा को परेशान किए बिना बाज भी नहीं आते। दरअसल, नगमा को नापसंद किए जाने का सिलसिला उसी दिन शुरू हो चुका था, जब पार्टी ने नगमा को मेरठ से अपना उम्मीदवार घोषित किया था। तब एक पूर्व विधायक आैर एक पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष 2014 लोक सभा चुनाव में खुद को पक्का उम्मीदवार मानकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुके थे। नगमा की घोषणा होते ही ये दोनों नेता आैर इनके समर्थकों के लिए नगमा नापसंद बन गर्इ।

नोमिनेशन से ही ड्रामा शुरू


चुनाव में पर्चा दाखिल करने की आखिरी तारीख से एक दिन पहले नगमा अपना पर्चा इसलिए नहीं भर पाई क्‍योंकि पार्टी के एक गुट के नेता भरा नोमिनेशन फार्म लेकर चंपत हो गए। नगमा आरआे के सामने करीब दो घंटे तक खड़ी रही। फिर वह अगले दिन अपना नोमिशनेशन भर सकी। चुनाव की तैयारियों को लेकर भी नगमा के सामने गुटबाजी सामने आई, लेकिन वह चुनाव पर ध्यान लगाए रहीं। चुनाव में हालांकि हार गर्इ, लेकिन पार्टी में नगमा की नापसंदगी की वजह से वोट भी ज्यादा हासिल नहीं कर पायी थी।

नापसंदगी अब आैर भी बढ़ गर्इ

चुनाव होने के बाद स्थानीय पार्टी नेताआें ने समझा कि अब तो नगमा का पत्ता मेरठ से पूरी तरह कट गया है, लेकिन नगमा जिस तरह मेरठ से आज भी जुड़ी हुर्इ हैं, उससे स्थानीय पार्टी नेताआें की त्यौरियां पहले से ज्यादा चढ़ गर्इ हैं। पार्टी में ही चार से पांच नेता आैर उनके काफी समर्थक एेसे हैं, जो चाहते हैं कि नगमा बस यहां से किसी तरह जाए आैर उनका रास्ता साफ हो जाए। इसका ताजा उदाहरण हाल ही नगमा का मेरठ का दौरा रहा, जहां इन्होंने नगमा के सामने ही विरोध करना शुरू कर दिया था । यह तो पार्टी की बात रही। अन्य पार्टियों के नेता आैर उनके समर्थक भी तो नहीं चाहते कि नगमा शहर में जुड़ी रहे, क्योंकि उन्हें मालूम है कि नगमा का ग्लैमर कब लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगे आैर उन पर भारी पड़ जाए।
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