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15 अगस्त 1947 को लाल किले पर पंडित जवाहर लाल नेहरू ने फहराया था इनके हाथ का बना तिरंगा, देखें वीडियो

खबर की मुख्य बातें- -देश में सिर्फ तीन जगह तिरंगा बनाया जाता है -पहला कोलकाता, दूसरा मुबंई और तीसरा मेरठ में -मेरठ में गांधी आश्रम में झंडा बनाया जाता है

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मेरठ

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Rahul Chauhan

Aug 03, 2019

nehru

के.पी त्रिपाठी

मेरठ। भारत की आन,बान और शान का प्रतीक है तिरंगा झंडा। जो कि देश की स्वतंत्रता और संविधान का भी प्रतीक है। आज हम आपको एक ऐसे परिवार के बारे में बताने जा रहे हैं जिनसे पूर्वजों के हाथ का बना तिरंगा 15 अगस्त 1947 को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लालकिले पर फहराया था।

यूं तो 15 अगस्त हो या 26 जनवरी आम लोगों के लिए तो तिरंगे की अहमियत इन्हीं दिनों में होती है। लेकिन मेरठ की गुमनाम गली में एक परिवार ऐसा भी है, जिनके लिए पूरे वर्ष तिरंगे की बहुत अहमियत होती है। मेरठ की सुभाष नगर गली नंबर 11 निवासी रमेश चंद्र का ये खानदानी काम है। उनके पिता पहले इस तिरंगा को सिलने का काम करते थे। उससे पहले उनके दादा इस काम में जुटे हुए थे। वर्तमान में रमेश चंद्र ने अपने पुश्तैनी काम की कमान संभाल ली है। 15 अगस्त की तैयारी को लेकर रमेश चंद्र दिन-रात आर्डर पूरा करने में लगे हैं।

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रमेश चंद्र बताते हैं कि देश में सिर्फ तीन जगह तिरंगा बनाया जाता है। पहला कोलकाता, दूसरा मुबंई और तीसरा मेरठ में। मेरठ में गांधी आश्रम में झंडा बनाया जाता है। लेकिन गांधी आश्रम में तिरंगा बना-बनाया मिलता है। जबकि इसको सिलने का काम वर्ष 1947 से रमेश चंद्र का परिवार कर रहा है। रमेश चंद्र बताते हैं कि तिरंगा को बनाते समय कई बातों का पालन करना पड़ता है। ऐसा न करने पर तिरंगा का अपमान भी हो सकता है। इसलिए इसको सिलते समय बहुत सावधानी बरतनी होती है। मशीन पर सिलते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि कहीं ये नीचे लटककर न गिर जाए। या फिर कोई इसके ऊपर से इसको लांघ कर न निकल जाए।

बाबा के हाथ का बना था लाल किले पर फहराया गया पहला झंडा

रमेश चंद्र के पिता का देहांत दो महीने पहले ही हुआ। रमेश के पिता नत्थे सिंह आजादी के बाद से ही राष्ट्रीय ध्वज को सिलने का काम कर रहे थे। उससे पहले रमेश के बाबा इस काम को कर रहे थे। रमेश बताते हैं कि जिस दिन देश आजाद हुए उस दिन संसद भवन में तिरंगा झंडा का प्रस्ताव पास हुआ और इस झंडे को बनाने का काम उनके बाबा लेखराज सिंह को मिला। उनके बाबा ने रातों रात लालकिले पर फहराने के लिए तिरंगा तैयार किया जो सुबह चार बजे दिल्ली पहुंचाया गया था। उसके बाद वह झंडा लालकिले की प्राचीर से जवाहर लाल नेहरू ने फहराया था।

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मेरठ ही नहीं दूर तक करते हैं सप्लाई

रमेश बताते हैं कि उनके हाथ के बने झंडे की सप्लाई मेरठ गांधी आश्रम ही नहीं दूर-दूर तक होती है। उनको कभी कोलकाता और मुंबई से भी झंडे का आर्डर मिलता है। रमेश के अनुसार राष्ट्रीय ध्वज बनाने के अपने कई नियम हैं। सबसे पहला नियम तो इसकी सिलाई ही होती है। इनमें 12 से 16 सिलाई लगाई जाती है। बीच में भी सिलाई लगाई जाती है। संविधान के अनुसार इससे अधिक सिलाई राष्ट्रीय ध्वज में लगाना अपराध की श्रेणी में माना जाएगा। साथ ही यह तिरंगे का अपमान भी होगा।