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मेरठ

VIDEO: फिल्म ‘जीरो’ के इस घंटाघर की आवाज पर लोग मिलाते थे अपनी घड़ी की सुइयां

ब्रिटिश राज में निर्माण हुआ था मेरठ के घंटाघर का

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मेरठ। शाहरूख की फिल्म ‘जीरो’ में जिस घंटाघर का जिक्र हैं उसका इतिहास और उसके किस्से जानकर आप रह जाएंगे हैरान। करीब 50 साल पहले तक जब इसमें लगी घड़ी की सुई एक-एक घंटे के बाद आवाज किया करती थी तो लोग इससे अपनी कलाई घड़ी मिलाया करते थे। इसकी आवाज करीब 15 किमी के दायरे में सुनाई देती थी। ये कोई ऐसा वैसा घंटाघर नहीं है। इसमें लगी घड़ी अगर बिगड़ी तो इसे सुधारने वाला भी आसपास तो क्या पूरे देश में भी तलाशे नहीं मिलेगा। एक ही हुनरमंद परिवार है जो कि इस घंटाघर में लगी घड़ी को ठीक कर सकता है। और वो हैं हाजी अब्दुल अजीज का परिवार। जिनकी चार पीढ़ी इस घंटाघर की घड़ी की हिफाजत और रखरखाव कर रही है। देश की इतिहास की यह घरोहर की मेरठ प्रशासन तो सुध लेता ही नहीं। सुध वो लोग भी नहीं लेते जिनकी पार्टियों के बड़े नेताओं ने इस घंटाघर के नीचे खड़े होकर कभी आजादी के तराने गाए थे और देश को आजादी दिलाने के लिए नारे लगाए थे। बात लगभग सौ साल से भी अधिक है। जब अंग्रेजी राज था और मेरठ के घंटाघर की घड़ी अचानक बंद हो गई तो आस-पास ही नहीं दूसरे मुल्कों में भी इस घड़ी को सुधारने वाला तलाशा गया लेकिन कहीं कोई कारीगर न मिल सका। करीब छह महीने तक इसकी घड़ी की सुइयां हिल न पाई। उस दौरान मेरठ के तत्कालीन कलक्टर जेम्स पियरसन थे। उन्होंने दुनिया की नामी घड़ी बनाने वाली जर्मनी की वेस्टर्न वॉच कंपनी को पत्र लिखकर कोई कुशल कारीगर मेरठ भेजने की गुजारिश की। कंपनी ने अपने जवाब में लिखा कि मेरठ का ही हाजी अब्दुल अजीज एक बेहतरीन घड़ी कारीगर है। अब्दुल को ही मेरठ भेजा जाए। अब्दुल अजीज के मेरठ पहुंचने पर कलक्टर पियरसन ने उन्हें घंटाघर में ही रहकर घड़ी की देखभाल करने की जिम्मेदारी दी। तब से अब तक अब्दुल अजीज की तीन पीढियां शहर की पहचान को जिंदा रखे हैं। उनके पोते शमशुल अजीज कहते हैं कि उन्हें इस बात का मलाल है कि घड़ी के रखरखाव के लिए कहीं से कोई मदद नहीं मिलती। इस बार घड़ी को शाहरूख खान ने ठीक कराया है। इसको ठीक करने में ही करीब 4 लाख का खर्च आ गया है। अंग्रेजी शासन से शुरू हुई अब्दुल अजीज परिवार की देश सेवा आज तक बदस्तूर चली आ रही है। अब्दुल अजीज का पौत्र समशुल अजीज आज भी अपने पूर्वजों की विरासती भक्ति भाव को जिंदा रखे हैं। कोई औलाद न होने व पत्नी की मौत के गम ने समशुल को तोड़ सा दिया है। फिर भी रोज सुबह सवेरे 65 वर्षीय शमसुल घंटाघर पहुंचकर पूरे परिसर की सफाई करते हैं। यही नहीं शमसुल ने अंग्रेजी समय के बहुत सारे उर्दू और अंग्रेजी के उपन्यास भी संजो कर रखे हुए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि अंग्रेजी हुकूमत से घंटाघर की देखभाल कर रहे अब्दुल अजीज परिवार को इसके लिए न तो कोई वेतन मिलता है और न कोई आर्थिक मदद।