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मुस्लिम परिवार की बेटियां 50 साल से बांध रही हिन्दू भाई को राखी, इस तरह हुई थी शुरुआत, देखें वीडियो

खास बातें दोनों परिवार रक्षा बंधन को मनाते है उत्सव की तरह हिन्दू भाई मुस्लिम बहनों को शादी में देते हैं भात कहा- हिन्दू-मुस्लिम धर्म के बारे में न हम सोचते, न वे

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मेरठ। एक मुस्लिम परिवार की तीन बेटियां 50 साल से हिन्दू भाई को राखी बांधती आ रही हैं। वह नहीं रहे तो उनके बेटों को ये बेटियां राखी बांधती हैं। दोनों परिवारों के बच्चों के बच्चे भी अब आपस में राखी बांधते हैं। रक्षा बंधन त्योहार बड़े उत्सव की तरह मनाया जाता है। मेरठ के कोटला क्षेत्र का यह मुस्लिम परिवार शहर के थापर नगर के होम्योपैथी चिकित्सक के घर आकर रक्षा बंधन जिस तरह से मनाता है तो लोग देखते रह जातेे हैं। इसी तरह ईद पर हिन्दू भाई का परिवार इनके यहां आकर ईद मनाता है। हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे की ऐसी मिसाल दूसरी देखने को नहीं मिलती। इस बार गमी के कारण दोनों परिवारों ने रक्षा बंधन त्योहार नहीं मनाया। भाई का जब निधन हुआ तो उन्होंने वसीयत में लिखवाया कि दोनों परिवारों के बीच भाई-बहन का रिश्ता हमेशा कायम रहेगा।

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भाई-बहन के रिश्ते की ऐसे हुई शुरुआत

दरअसल, कोटला क्षेत्र की ये तीन बहनें फिरोजा, फरजाना और चांदबीबी हैं। चांदबीबी ने बताया कि 1970 की बात है, बड़ी बहन फिरोजा को नजला-जुकाम हुआ था। पिता ने फिरोजा को थापर नगर गली नंबर दो निवासी होम्योपैथी चिकित्सक डा. घनश्याम दास से दिखाया था और इलाज चला। इलाज के दौरान ही डा. दास ने फिरोजा को अपनी बहन बना लिया और रक्षा बंधन पर राखी बाधंने के लिए घर आने के लिए कहा। पहली बार फिरोजा ने डा. दास को राखी बांधी। इसकेे बाद फिरोजा के साथ फरजाना व चांदबीबी भी राखी बांधने लगीं। तभी से ये मुस्लिम बेटियां रक्षा बंधन पर डा. दास के परिवार के घर पर राखी बांधने के लिए जाती हैं।

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अब उनके बेटों को बांधती है राखी

डा. घनश्याम दास के तीन बेटे पुनीत, ललित और अमित।इनमें अमित अमेरिका में बड़ा डाॅक्टर है। अन्य दो बेटे भी डाॅक्टर हैं। तीन मुस्लिम बेटियों के बच्चे भी बड़े हो गए हैं। तीनों बहनें भाई डा. दास के बेटों को राखी बांधती हैं तो उनके बच्चे भी आपस में रक्षा बंधन मनाते हैं।

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रक्षा बंधन पर पूरे दिन होता है उत्सव

चांदबीबी का कहना है कि पिछले 50 वर्षों में रक्षा बंधन से पहले उनके भाई डा. दास के घर से आने का न्योता आता है। हम तीनों बहनें बच्चों की फेमलियों के साथ वहां पहुंचते हैं। भाई के बेटों की बहुएं सत्कार के बाद राखी बांधकर खाना खिलाकर शाम को भेजती हैं। डा. दास का बड़ा बेटा अमेरिका से जब घर आता है तो उनसे मिले बगैर नहीं जाता। चांदबीबी ने बताया कि दिसंबर में उनकी बेटी की शादी हुई थी तो तीनों बेटों मिलकर उन्हें भात दिया था। बेटी की ससुराल के लोग भी उनकेे भाई के यहां जाते हैं।

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हमेशा कायम रहेगा भाई-बहन का रिश्ता

चांदबीबी ने बताया कि एक बार ईद और रक्षा बंधन एक ही दिन आए थे तो हमारे परिवार के सभी लोगों ने भाई डा. दास के यहां जाकर अपना रोजा खोला था। उन्होंने बताया कि 1970 से अब तक शहर में कई बार हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए, 1982 दंगे में तो भाई हमारे घर पर ही थे। उन्होंने ऐसा ही महसूस किया, जैसे वह अपने घर पर हैं। लेकिन दोनों परिवारों के रिश्ते में रत्तीभर फर्क नहीं आया। इस बार भाई डा. दास के परिवार में एक मौत होने के कारण दोनों परिवार रक्षा बंधन नहीं मना रहे हैं। छोटी बहन चांदबीबी का कहना है कि भाई-बहन का यह रिश्ता दोनों परिवारों के बीच हमेशा कायम रहेगा, चाहे जो हो जाए।

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