
केरल में इस कलाकार की वजह से आई थी भयंकर बाढ़, खुद किया चौंकाने वाला खुलासा
केपी त्रिपाठी@Patrika.com
मेरठ। कहते हैं भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग और प्राकृतिक का बड़ा घनिष्ठ संबंध हैं। राग और मल्हार ऐसे होते हैं कि अगर उन्हें सुर, लय, ताल के साथ तारतम्य बैठाकर छेड़ा जाए तो वह प्राकृति को जरूर प्रभावित करते हैं। अक्सर हम सुनते हैं कि राग को गाकर वर्षा बुलाई जाती है, तो राग को गाकर ठंड भी भगाई जा सकती है।
राग भी हमारे संस्कृत के स्लोक जैसा ही दमखम रखते हैं। रागों ने मेघों को बरसने के लिए मजबूर किया तो राग ने तपती धूप से निजात भी दिलाने का काम किया। यह कहना है प्रसिद्ध बासुरी वादक पंडित रोनू मजूमदार का। जो आजकल मेरठ में स्पिक मैके विरसत के बैनर तले मेरठ में कार्यक्रम प्रस्तुत कर क्रांतिधरा पर समा बांध रहे हैं।
छेड़ी राग मेघ मल्हार की सरगम तो डूब गया सूबा
रोनू मजूमदार कहते हैं कि अब वे बारिश के मौसम में कभी राग मेघ मल्हार नहीं गांएगे। उन्होंने बताया कि इस मौसम में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने केरल के कोल्लम में राग मेघ मल्हार की ताल छेड़ी। उसी दिन से केरल में भयानक बारिश शुरू हो गई है। पूरा केरल बारिश के कारण बाढ़ से डूब गया है। इसलिए उन्होंने इस वर्षाकाल में यह राग बजाने से मना कर दिया है।
कोल्लम में बजा राग मेघ मल्हार तो हुई झमाझम
मैहर घराने के सुप्रसिद्ध बांसुरीवादक पंडित रोनू मजूमदार ने कहा कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में मौसम को प्रभावित करने की जबरदस्त क्षमता होती है। मेरठ में एक कार्यक्रम के दौरान जब पंडित रोनू से उनके चाहने वालों ने वर्षाकाल का राग मेघ मल्हार बजाने की फरमाइश की तो उन्होंने हाथ जोड़ लिए। उन्होंने कहा कि केरल में मानसून के दौरान मेघ मल्हार बजाने के बाद वह इस ऋतु में फिर से इसे नहीं दोहराएंगे।
उन्होंने बताया कि लोगों की फरमाइश और मानसून को देखते हुए केरल में एक कार्यक्रम में उन्होंने गंभीर प्रकृति के राग मेघ मल्हार का घंटेभर वादन किया था। इसके बाद बादलों की उमड़-घुमड़ तेज हुई और बारिश सूबे पर कहर बनकर टूटी। संगीत साधकों और उनके प्रशंसकों का कहना है कि बासुरी जब पंडित जी के होठों पर लगती है तो अपने आप ही बजना शुरू हो जाती है।
खमाज है पसंदीदा राग
पंडित रोनू मजूमदार को सर्वाधिक मेघ मल्हार और खमाज राग पसंद हैं। उन्होंने कहा कि वे इस बात पर पूरा यकीन रखते हैं कि संगीत की साधना में डूबा हुआ व्यक्ति मौसम को अपने राग के बल पर परिवर्तित कर देता है। उन्होंने माना कि बारिश की कोई भी वजह क्यों न हो, किंतु केरल के बाद हुए कई कार्यक्रमों में उन्होंने इस राग में फिर नहीं बजाया। यहां तक कि लोकसंगीत एवं उपशास्त्रीय गायन के अंतर्गत आने वाली कजरी एवं अन्य धुनों से भी परहेज कर रहे हैं। उससे भी मौसम में परिवर्तन की संभावना पूरी रहती है।
Published on:
28 Aug 2018 05:13 pm
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