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Special- इसी मंदिर से भड़की थी आजादी की चिंगारी, हिल गया था ब्रिटेन

आज औघड़नाथ मंदिर के नाम से उत्तर भारत में प्रसिद्ध है मेरठ का काली पलटन

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मेरठ

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sharad asthana

Jan 24, 2018

kali paltan meerut

kali paltan meerut

मेरठ।
हरेक सरफरोश उठा सिलाहे-जंग चूमकर
वुुुफूरे -अल्मो-शौक में चला है झूम-झूमकर

1857 की गदर में यह शेर हर उस भारतीय की जुबान पर था, जाे गदर में शामिल था। मई 1857 की क्रांति का गवाह मेरठ का काली पलटन आज औघड़नाथ मंदिर के नाम से उत्तर भारत में प्रसिद्ध हो चुका है, लेकिन देश में सर्वप्रथम आजादी की चिंगारी इसी मंदिर प्रांगड़ से भड़की थी।

काली पलटन के नाम से था मशहूर
पुराने जमाने यह क्षेत्र काली पलटन के नाम से मशहूर था। काली पलटन भारतीय सैनिकों की टुकड़ी को कहा जाता था। यह टुकड़ी अंग्रेजी सैनिक रेजीमेंट के बाहर टेंट में रहती थी। भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम का आरंभ यहां से हुआ था। इस मंदिर में अनेक स्वतंत्रता सेनानी आते, ठहरते और अधिकारियों से गुप्त मंत्रणा किया करते थे।

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हाथी वाले बाबा मतलब धूधूपंत नाना साहब
इतिहासकार केडी शार्म की मानें तो हाथी वाले बाबा के नाम से काली पलटन के पास एक व्यक्ति आता था। कहते हैं वह धूधूपंत नाना साहब थे। मंदिर प्रांगण में स्थित कुएं पर सेना के जवान पानी पीते थे। हाथी वाले बाबा सेना के जवानों में जोश और आजादी के प्रति जुनून जगाने का कार्य करते थे। हाथी वाले बाबा ने भारतीय सैनिकों में देशप्रेम की भावना को जागृत किया और सैनिकों को बताया कि उन्हें जो नए कारतूस दिए जा रहे हैं, उनमें चर्बी का प्रयोग किया जा रहा है।

24 अप्रैल 1857 को अंग्रेजी हुकूमत को भारतीय सैनिकों ने नकार दिया
कारतूस में चर्बी के प्रयोग की खबर जंगल में आग की तरह फैली। इसके बाद 24 अप्रैल 1857 को काली पलटन के 85 जवानों ने अंग्रेजी हकूमत को नकारते हुए चर्बीयुक्त कारतूस का प्रयोग करने से इंकार कर दिया। अंग्रेजी अधिकारियों ने इन जवानों को सजा देकर मामला दबाने की कोशिश की। 9 मई 1857 को सुबह मेरठ में मौजूद सारे भारतीय और अंग्रेजी सिपाहियों की एक साथ परेड हुई। इसमें 85 क्रांतिकारी सैनिकों को बीच में खड़ा करके उनकी वर्दियां उतारी गईं। उन्‍हें सबके सामने बेड़ि‍यां भी पहनाई गईं। इसके बाद उनको कैदकर मेरठ की विक्टोरिया पार्क स्थित नई जेल में रखा गया।

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कर्नल फिनिंश की हत्या से जल उठी ज्वाला
केडी शर्मा के अनुसार, 10 मई 1857 को कर्नल फिनिंश ने विद्रोह की सूचना मिलते ही देशी और अंग्रेजी सैनिकों को परेड ग्रांउड में एकत्र किया। भारतीय सैनिकों को एकत्र करने का उद्देश्य उनको परेड में उलझाकर रखना था। इसी दौरान एक घुड़सवार वहां आया और उसने बताया कि काली पलटन ने गोला-बारूद भंडार और हथियारों पर कब्जा कर लिया है। इतना सुनते ही यहां के सैनिकों ने कर्नल फिनिंश पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं। इससे अंग्रेज सैनिक जान बचाकर भागने लगे। इसके बाद परेड ग्रांउड में खड़े अन्य अंग्रेज अधिकारियों को भी गोलियां मार दी गईं।

नई जेल तोड़कर 85 सैनिकों को मुक्त कराया
काली पलटन ने इसी दौरान विक्टोरिया पार्क स्थित नई जेल पहुंचकर 85 भारतीय सैनिकों को मुक्त कराया। इसके बाद काली पलटन और 85 भारतीय सैनिकों ने मेरठ में अंग्रेजों की कोठी पर धावा बोल दिया। वहां जो भी अंग्रेज अधिकारी दिखा, उसको भारतीय सैनिकों ने मार गिराया।

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शारलेट चैंबर्स की मौत से हिल गया था ब्रिटेन
10 मई 1857 काे स्‍वतंत्रता संग्राम के पहले दिन मारे जाने वालों में यूरोपियंस में 11वीं देशी पैदल सेना के लेफ्टीनेंट रिचर्ड वेलेस्ली चैंबर्स की पत्नी शारलेट चैंबर्स भी थी। इस घटना से समूचा ब्रिटेन हिल गया था। इतिहासकार के अनुसार, शारलेट चैंबर्स को मौलाबख्श नामक सैनिक ने मारा था। बाद में मौलाबख्श को फांसी पर चढ़ा दिया गया था।

शाम को चार्ल्‍स डाउसन का बंगला फूंका
भारतीय सैनिकों ने 10 मई 1857 की शाम को सेना में पशु चिकित्सक चार्ल्‍स डाउसन के बंगले घेर लिया। उन्‍होंने उनको बाहर निकलने के लिए कहा, लेेकिन वह नहीं निकले। इसके बाद सैनिकों ने उन पर गोली चला दी। इससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। बताते हैं कि दो दिन तक उनका शव बंगले के बाहर पड़ा रहा लेकिन कोई उसे उठाने नहीं आया। सैनिकों ने मशाल फेंककर बंगले में आग लगा दी थी।

शाम को दिल्ली कूंच कर गए क्रांतिकारी
मेरठ में गदर के बाद शाम को भारतीय सिपाही अपने परेड ग्रांउड में एकत्र हुए और सभी ने हथियार कब्जे में ले लिए। सिपाहियों ने अपने घोड़ों को तैयार किया। तभी एकाएक अश्वसेना के परेड ग्रांउड पर एक नारा गूंजा, दिल्ली चलो और सारे सिपाही दिल्ली की ओर कूंच कर गए। इसके साथ ही फकीर रूपी बाबा भी दिल्ली के लिए प्रस्थान कर गए।