
मेरठ। मेरठ यानी पुराने जमाने का मयराष्ट्र। इसे रावण की ससुराल कहा जाता है। यहां पर बड़े-बड़े सिद्धपीठ हैं। जिनकी अपनी अलग-अलग मान्यताएं हैं। इन्हीं में से एक प्रसिद्ध सिद्धपीठ है सदर स्थित काली देवी का मंदिर। इस मंदिर में नवरात्र में प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में लोग काली की पूजा करने आते हैं। मंदिर में नवरात्र के दौरान काफी भीड़ लगती है। मेरठ ही नहीं आसपास के जिलों से भी लोग काली की विशेष पूजा के लिए यहां पर आते हैं। इस मंदिर में सिर्फ हिन्दू धर्म के लोग ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों के लोग भी देवी के चमत्कार से प्रभावित होकर पूजा करते है। सदर बाजार का कोई व्यापारी ऐसा होगा जो काली के मंदिर में प्रतिदिन पूजन के लिए न आता हो।
मयदानव के परिजनों का पूजा केंद्र
मान्यता है कि इस काली के इस सिद्धपीठ में मयदानव के परिजन पूजन करने के लिए आते थे। खुद मयदानव देवी के पूजा के लिए यहां पर आया करते थे। मंदिर को पांच सौ साल पूर्व पश्चिम बंगाल से आए पुजारी ने देखभाल के लिए संभााला। इसके बाद से इस मंदिर की पूजा और इसकी देखभाल बंगाली परिवार ही करते हैं। मंदिर में रामनवमी और दशमी के दिन होने वाली विशेष पूजा काली मंदिर के आकर्षण का केंद्र रहती है। मंदिर में चालीस साल से पूजा करने आ रहे प्रीत कहते हैं कि वे प्रतिदिन मंदिर में आते हैं और देवी ने उनकी हर इच्छा पूरी की है।
नवरात्र के दिनों में दी जाती है बलि
मंदिर में काली मां के पास बैठी मोनिका कहती हैं कि वे यहां पर बचपन से ही आ रही है। ये उनका मायका है। उन्होंने बताया कि ये देवी का एकमात्र सिद्धपीठ है, जहां पर मेघनाद के नाना पूजा करने आया करते थे। इस मंदिर में नवरात्र के अवसर पर विशेष पूजा की जाती है। मंदिर में नवरात्र के मौके पर बलि दी जाती है। उन्होंने बताया कि मां काली अपने भक्तों की मुराद जरूर पूरी करती हैं। इनसे जो भी मांगों, वह पूरा होता है।
Updated on:
04 Oct 2019 07:27 pm
Published on:
06 Oct 2019 04:00 am
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