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सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े निर्देश के बाद नेताजी का ‘असली चेहरा’ अाएगा सामने

इन पर कर्इ आपराधिक मामले दर्ज, पुलिस इनके पीछे रहती आयी सदा  

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पार्टी हार्इकमान भाजपा, सपा आैर बसपा के इन चहेतों को मिल गर्इ राहत, वरना मुश्किल हो जाता इनका चुनाव लड़ना

मेरठ। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने दागी नेताआें के चुनाव लड़ने पर रोक लगने वाली याचिका पर अपना फैसला सुना दिया। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में एेसे दागियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने से इनकार करते हुए सिर्फ चार्जशीट के आधार पर कार्रवार्इ नहीं की जी सकती। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पार्टियां एेसे नेताआें के आपराधिक रिकार्ड वेबसाइट पर डालें। नेताआें के बारे में आम जनता को जानकारी होनी चाहिए। एेसे में वेस्ट यूपी के आपराधिक रिकार्ड रखने वाले नेताआें ने राहत की सांस ली है। मुख्य रूप से मेरठ दो एेसे ताजा उदाहरण हैं, जिनके आपराधिक रिकार्ड हैं, पुलिस इनके पीछे लगी हुर्इ है। खास बात यह है कि अपनी पार्टी हार्इकमान के चहेते बने हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से इनके चुनाव लड़ने का रास्ता साफ हो गया है।

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मायावती के खास चहेते हैं बसपा के पूर्व विधायक

हस्तिनापुर के बसपा के पूर्व विधायक योगेश वर्मा सबसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सबसे ताजातरीन उदाहरण हैं। एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के संशोधन फैसले का विरोध करने को लेकर दलित समाज के लोगों ने मेरठ में दो अप्रैल को उपद्रव किया था। जिला व पुलिस प्रशासन ने इसके पीछे पूर्व विधायक योगेश वर्मा का हाथ होने की बात कहकर रासुका आैर मुकदमे दर्ज कराए थे। तभी से योगेश वर्मा जेल में थे। पिछले दिनों हार्इकोर्ट ने रासुका हटाने के आदेश दिए है। इन पर पहले सेआपराधिक मामले दर्ज हैं। योगेश वर्मा बसपा सुप्रीमो मायावती के खास सिपाही बताए जाते हैं। मायावती पिछली बार जब सत्ता में थी तो योगश की आपराधिक छवि आैर दर्ज मामलों के चलते ही मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। बाद में पार्टी में योगेश वर्मा की वापसी भी करा दी थी। दरअसल, अपनी दबंगर्इ छवि के चलते योगेश की वेस्ट यूपी के दलित समाज में अच्छी पकड़ है। इसलिए मायावती को उनका पार्टी में वापसी कराना मजबूरी बन गया था। योगेश वर्मा पर अब भी केस चल रहे हैं।

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अखिलेश के खास सिपाही हैं अतुल

अखिलेश यादव सरकार के समय सपा नेता अतुल प्रधान ने मेरठ के फलावदा में जन रैली करार्इ थी। यह रैली इतनी सफल रही थी कि मंच से ही अखिलेश ने अतुल की जमकर तारीफ की थी। इसके बाद से अतुल अखिलेश के खास सिपाही के तौर पर देखे जाने लगे। अखिलेश यादव भी महत्वपूर्ण मामलों में अतुल से राय लेते हैं, एेसी सपा नेताआें में चर्चा है। अतुल सीसीएस विश्वविद्यालय मेरठ की छात्र राजनीति से जुड़े रहे हैं। उस दौरान उन पर कर्इ मामले दर्ज हैं। वह पुलिस से हमेशा बचते रहे हैं। पिछले साल चर्चित सुमित एनकाउंटर के उभरने के बाद अतुल ने मेरठ कमिश्नरी पार्क पर न सिर्फ धारा 144 के बावजूद सभा की, बल्कि एक अन्य कार्यक्रम में अतुल ने एनकाउंटर करने वाले इंस्पेक्टर को चीर देने की धमकी दे डाली थी। इस मामले में मेरठ की पूर्व एसएसपी मंजिल सैनी ने मुकदमे दर्ज कराए थे। तब से पुलिस अतुल प्रधान के पीछे है।

इनका कहना है...

सपा के पूर्व कैबिनेट मंत्री व सपा नेता शाहिद मंजूर का कहना है कि नेताआें पर जितने भी मुकदमे दर्ज होते हैं, वे राजनीतिक द्वेष भावना के अंतर्गत कराए जाते हैं। जहां तक मुकदमा दर्ज वाले उम्मीदवारों को टिकट देने का सवाल है, ये फैसले पार्टी हार्इकमान तय करती है। एेसे नेताआें को टिकट मिलेगा या नहीं इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का यह है आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने दागी नेताआें के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने संबंधी आदेश में कोर्ट ने कहा है कि आम जनता को अपने नेताओं के बारे में जानकारी होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि हर नेता को अपने आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी चुनाव लड़ने से पहले चुनाव आयोग को देनी चाहिए और इस मामले पर संसद को कानून बनाना चाहिए। सभी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से पहले तान बार प्रिंट मीडिया और एक बार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अपने रिकॉर्ड की पूरी जानकारी देनी होगी। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ इस से संबंधित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस आरएफ नरिमन, जस्टिस एम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा शामिल हैं। इससे पहले सुनवाई में ये कहा गया था कि ज्यादातर मामलों में आरोपी नेता बरी हो जाते हैं, इसलिए सदस्यता रद्द करने जैसा कोई आदेश न दिया जाए।

याचिका में की गई थी ये मांग

बता दें कि इस याचिका में मांग की गई थी कि अगर किसी व्यक्ति को गंभीर अपराधों में 5 साल से ज्यादा सजा हो और किसी के खिलाफ आरोप तय हो जाएं तो ऐसे व्यक्ति या नेता के चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए। इस मामले पर कोर्ट ने अगस्त में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। गौरतलब है कि एक अन्य मामले में केंद्र द्वारा सुप्रीम कोर्ट को दी गई जानकारी के अनुसार 11 राज्यों में फिलहाल दागी एमपी और एमएलए के खिलाफ 1233 मामले पेंडिंग हैं। 1233 मामलों में 1017 केस पेंडिंग हैं 136 मामलों की सुनवाई हो चुकी है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 12 स्पेशल कोर्ट का गठन किया गया था। दिल्ली में दो जबकि यूपी, केरल, बिहार, वेस्ट बंगाल, तामिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में एक-एक स्पेशल कोर्ट बनाए गए हैं। इन मामलों को स्पेशल कोर्ट में ट्रांसफर किया गया है।

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