19 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

1979 – मदर टेरेसा को मिला नोबेल पुरस्कार

मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया

3 min read
Google source verification

जयपुर

image

Sunil Sharma

Aug 12, 2017

1979 - mother teresa

1979 - mother teresa

नोबेल पुरस्कार दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार माने जाते हैं और निश्चित ही इन्हें पाने वाले पूरे विश्व द्वारा सम्मानित होते हैं और लाखों करोड़ों लोगों को अपने-अपने क्षेत्रों में अच्छा करने की प्रेरणा देते हैं। आज हम आपको ऐसे ही एक महिला मदर टेरेसा के बारे में बता रहे हैं जिन्होंने अपने उत्कृष्ट कार्यों से यह पुरस्कार जीता।

मदर टेरेसा का जन्म 1910 में युगोस्लाविया के एक गांव में हुआ था। वह आयरलैण्ड में लारेटो नन्स के एक समारोह में सम्मिलित हुई थीं और 1929 में उन्हें इसी केन्द्र के एक कार्यक्रम में भारत आने का मौका मिला। भारत ने उन्हें प्रभावित किया और 1946 में वह कोलकाता पहुंचीं। उससे पहले बंगाल 1942 में भयंकर अकाल से गुजर चुका था यहां कि गरीबी देखकर वह दुखी हुईं। मदर टेरेसा ने इस स्थिति के निपटने के लिए कलकत्ता में काम शुरू किया।

उन्होंने भारतीय नन्स का (मसीही महिलाएं) एक छोटा सा गुट बनाया और उन्हें ट्रेनिंग देक र लावारिस बच्चों की देखभाल के लिए क्लीनिकों और स्वस्थ्य केन्द्रों पर लगा दिया। उनके इस काम का बेहद अनुकूल प्रभाव हुआ, इससे उत्साहित होकर मदर टेरेसा ने कोलकाता में एक अनोखा अस्पताल खोला-‘निर्मल हृदय’ जिसमें निराश्रित, असहाय लोगों के इलाज की व्यवस्था की, व विकलांग, निराश्रित, तथा तपेदिक से ग्रस्त बच्चों के लिये एक ‘शिशु भवन‘ स्थापित किया। मदर टेरेसा के प्रयास से छह डिस्पेंसरियां भी चलाई जाने लगीं जिनमें स्वयंसेवी डॉक्टरों ने अपनी सेवाएं देनी शुरू की।

कुष्ठरोग उन दिनों जीवन का श्राप मना जाता था, जबकि कुष्ठ रोगी देश में बढ़ते जा रहे थे और उनके उपचार की व्यवस्था बहुत कम थी। ऐसे में मदर टेरेसा का ध्यान इस ओर गया। उन्होंने ननों द्वारा संचालित मोबाइल क्लीनिक चलाए, जिनमें अस्पताल से विशेष रूप से कुष्ठ रोगियों के उपचार के लिए प्रशिक्षित स्टाफ का प्रबंध था। 1970 तक वे गरीबों और असहायों के लिए अपने मानवीय कार्यों के लिए जानी जानें लगीं। इन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।

मदर टेरेसा के जीवनकाल में मिशनरीज ऑफ चैरिटी का कार्य लगातार विस्तृत होता रहा और उनकी मृत्यु के समय तक यह 123 देशों में 610 मिशन नियंत्रित कर रही थीं। इसमें एचआईवी/एड्स, कुष्ठ और तपेदिक के रोगियों के लिए धर्मशालाएं/ घर शामिल थे और साथ ही सूप, रसोई, बच्चों और परिवार के लिए परामर्श कार्यक्रम, अनाथालय और विद्यालय भी थे। मदर टेरसा की मृत्यु के बाद इन्हें पोप जॉन पॉल द्वितीय ने धन्य घोषित किया और इन्हें कोलकाता की धन्य की उपाधि प्रदान की।

मदर टेरेसा ने पचास से अधिक राहत केन्द्र खोले जिनमें खाद्य, दूध तथा कपड़े मिश्नरियों द्वारा इकट्ठा करके लाए गए, जहां से समुचित वितरण की व्यवस्था शुरू हुई। इसके साथ-साथ, बेहद गरीब इलाकों में नियमित स्कूल शुरू किये जिनमें बच्चों को हिन्दी पढऩा, लिखना तथा सामान्य अंकगणित का ज्ञान दिया जाने लगा। मदर टेरेसा ने ऐसी ही व्यवस्था दिल्ली में भी शुरू की, साथ ही दिल्ली में बिना मां-बाप के बच्चों तथा मानसिक रूप से बीमार बच्चों के लिये विशेष केन्द्रों की स्थापना की। मदर टेरेसा का ईसा में अदम्य विश्वास था और वह सेवा को ईश्वर की भक्ति का ही रूप मानकर स्वीकार करती थीं। उन्होंने जो भी सेवा-कार्य आजीवन किया, उसके लिये उनका कहना था कि यह उनको प्रभु का आदेश है, जो उन्हें अपनी अंत: प्रेरणा से मिला है। मदर टेरेसा को देश-विदेश में अनेकों सम्मान मिले।

उन्हें अपने मिशन के लिये विश्वभर से अनुदान सहायता प्राप्त हुई, लेकिन उन्होंने सादा जीवन ही जिया। नीले बार्डर वाली उनकी सफेद साड़ी उनका प्रतीक बन गई। वर्ष 1979 में मदर टेरेसा को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया। 1980 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इसके पहले 1971 में उन्हें जॉन केनेडी अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका था। इसी वर्ष मदर टेरेसा ने पोप जॉन शांति पुरस्कार भी पाया था। भारतीयों को इस बात का गर्व है कि मदर टेरेसा ने भारत को ही जाने के बाद भी विश्व भर को अपनी सेवाएं प्रदान कीं, सन 1997 में मदर टेरेसा का देहांत हो गया।