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आजादी @70: रेडियो: आजादी के आंदोलन से लेकर मन की बात तक, कहीं नहीं चूकेगा

अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा करने के बाद सबसे पहले प्रेस पर शिकंजा कसा थाए उससे भारत में बीस के दशक में शुरू हुआ रेडियो भी अछूता नहीं रहा था।

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Mazkoor Alam

Aug 14, 2017

independent India

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अंग्रेजों ने रेडियो की सारी लगाम उसने अपने हाथ में रखी थी। लेकिन आजादी के परवाने कब इसकी परवाह करते हैं। साल 1939 की बात है। द्वितीय विश्व युद्ध का आगाज हो चुका था। सरकार ने सूचनाओं पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से अखबारों पर सेंसरशिप लगा दिया था और देश में चलने वाले सारे रेडियो के लाइसेंस रद्द कर दिए गए और रेडियो क्लब चलाने वालों को आदेश दिया कि अपने.अपने रेडियो ट्रांसमीटरों को सरकार के पास जमा करा दें। ऐसे में जब रेडियो इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त बॉम्बे टेक्निकल इंस्टीट्यूट बायकुला के प्रिंसिपल नरीमन प्रिंटर ने जब लाइसेंस रद्द होने की खबर सुनीए उन्होंने तुरत अपने रेडियो ट्रांसमीटर को खोलकर उसके पुर्जे-पुर्जे अलग कर लिए और अलग-अलग पुर्जों को अलग.अलग जगह पर छुपा दिए। उनका वह ट्रांसमीटर 10 किलोवाट का था। नरीमन प्रिंटर ने उसमें और कलपुर्जे जोडक़र उसकी क्षमता सौ किलोवाट कर दी। इसके बाद ट्रांसमीटर को अंग्रेजों से बचाने के लिए उसे अलग-अलग स्थानों पर ले गए और 1942 तक अपने पास छिपा कर रखे रहे।


अपना रेडियो स्टेशन शुरू करने के लिए उनके पास माइक जैसे कुछ सामान की कमी थी। जो शिकागो रेडियो के मालिक नानक मोटवानी की दुकान से उन्होंने हासिल कर ली। इसके बाद मुंबई के चौपाटी इलाके की सीव्यू बिल्डिंग से 14 या 27 अगस्त 1942 से उषा मेहताए नरीमन प्रिंटर व अन्य लोगों ने नेशनल कांग्रेस रेडियो का प्रसारण शुरू किया। इस रेडियो से अपने पहले प्रसारण में उद्घोषक उषा मेहता ने कहाए 41.78 मीटर पर एक अनजान जगह से यह नेशनल कांग्रेस रेडियो है।

यह वह समय थाए जब भारत छोड़ो आंदोलन पूरे शबाब पर था और गांधी जी समेत तमाम नेता 9 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिए गए थे और प्रेस पर पाबंदी लगा दी गई थी। इसके बाद ही ष्नेशनल कांग्रेस रेडियोष् ने अपना प्रसारण किया और पकड़े जाने तक इसका प्रसारण जारी रहा। अंग्रेज अधिकारियों की पकड़ में आने से बचने के लिए वे लगभग हर दिन अपनी जगह बदल लेते थे। इस खुफिया रेडियो को डॉ राममनोहर लोहियाए अच्युत पटवर्धन सहित कई प्रमुख नेताओं का सहयोग और समर्थन हासिल था। रेडियो पर महात्मा गांधी सहित देश के प्रमुख नेताओं के रिकार्ड किए गए संदेश बजाए जाते थे। इस गुप्त रेडियो से अल्मोड़ा की कुंती देवी के भी जुड़े होने की बात कही जाती है। एक जगह जिक्र आता है कि कुंती देवी ने गुप्त रेडियो पर आजादी का जयघोष भी किया था। इस रेडियो का बागियाना तेवर जारी रहा। प्रेस सेंसरशिप के इस दौर में इसने उन तमाम खबरों को भी प्रकाशित कियाए जिसे सेंसरशिप की वजह से अखबार प्रकाशित नहीं कर पा रहे थे. जैसे मेरठ में 300 सैनिकों के मारे जाने की खबरए कुछ महिलाओं के साथ अंग्रेजों के दुराचार जैसी खबरें आदि। यह सिलसिला करीब तीन माह तक चला। 12 नवम्बर 1942 को अंग्रेज सरकार ने नरीमन प्रिंटर और उषा मेहता को गिरफ्तार कर लिया और ष्नेशनल कांग्रेस रेडियोष् की कहानी यहीं खत्म हो गई।


उधर दूसरी तरफ नेशनल कांग्रेस रेडियो का प्रसारण शुरू होने से पहले रेडियो जर्मनी से नवंबर 1941 में सुभाष चंद्र बोस आजादी का बिगुल फूंक रहे थे। उन्होंने अपना क्रांतिकारी नारा तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा। रेडियो जर्मनी से भारतवासियों के नाम संदेश में दे चुके थे। इसके बाद 1942 में उन्होंने जर्मनी में ही आजाद हिंद रेडियो की स्थापना कीए जो बाद में सिंगापुर और रंगून से भारतीयों के लिए क्रांतिकारी समाचार प्रसारित करता रहा।

आजादी के बाद तेजी से फैला


स्वतंत्रता के पश्चात से 16 नवंबर 2006 तक रेडियो केवल सरकार के अधिकार में था। सरकारी संरक्षण में रेडियो का काफी प्रसार हुआ। 1947 में आकाशवाणी के पास छह रेडियो स्टेशन थे और उसकी पहुंच 11 प्रतिशत लोगों तक ही थी। आज आकाशवाणी के पास सवा दो सौ से अधिक रेडियो स्टेशन हैं और उसकी पहुंच 99 फीसदी भारतीयों तक है।


टेलीविजन के आगमन के बाद शहरों में रेडियो के श्रोता कम होते गएए पर एफएम रेडियो के आगमन के बाद अब शहरों में भी रेडियो के श्रोता बढऩे लगे हैं। लेकिन आजादी से पहले से चला आ रहा यह फरमान कि गैरसरकारी रेडियो पर से समाचार या समसामयिक विषयों की चर्चा नहीं की जा सकतीए अब भी जारी है।
यह कानून इसलिए बनाए क्योंकि सरकार को लगता है कि रेडियो का दुरुपयोग हो सकता है। पहले तो रेडियो स्टेशन भी सरकारी नियंत्रण में थाए उसे कोई खोल नहीं सकता था। इस बीच आम जनता को रेडियो स्टेशन चलाने देने की अनुमति के लिए सरकार पर दबाव बढ़ता रहा है।


इस बीच 1977 में एफएम रेडियो का प्रसारण भी शुरू हो गया। सर्वप्रथम इसका प्रसारण मद्रास रेडियो से हुआ। 1993 से निजी कंपनियों को लीज पर टाइम स्लॉट देने की शुरुआत हुई। 15 अगस्त 1993 में देश में मुंबई से स्वतंत्र एफएम चैनल की शुरुआत हुई। 1995 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि रेडियो तरंगों पर सरकार का एकाधिकार नहीं हो सकता। इसके बाद 2002 में शिक्षण संस्थाओं को कैंपस रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति दी। 16 नवंबर 2006 को यूपीए सरकार ने स्वयंसेवी संस्थाओं को रेडियो स्टेशन खोलने की इजाजत दी है। लेकिन इन रेडियो स्टेशनों में भी समाचार या सम.सामयिक विषयों की चर्चा पर पाबंदी हैए पर रेडियो जैसा जनमाध्यम के लोकतंत्र के लिए एक अहम माध्यम बन सकता हैए इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

मोदी के मन की बात हुई हिट
इस बात को बहुत बेहतर तरीके से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समझा। इसलिए उन्होंने रेडियो पर अपने ष्मन की बात कहानी शुरू की। टीवी और दूसरे तकनीकी संचार के दौर में रेडियो की लोकप्रियता में लगातार गिरावट आ रही थीए लेकिन मन की बात आने के बाद लोगों में रेडियो की तरफ दोबारा बढऩे लगा है। मन की बात आकाशवाणी पर प्रसारित किया जाने वाला एक कार्यक्रम है। जिसके जरिये भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के नागरिकों को संबोधित करते हैं। इस कार्यक्रम का पहला प्रसारण 3 अक्टूबर 2014 को किया गया। देश की करीब 68 फीसदी जनता इस प्रसारण को सुनती है।

सामुदायिक रेडियो रूबए जमाने का संचार
श्रव्य माध्यमों की तरक्की में सामुदायिक रेडियो की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। सामुदायिक रेडियो यानी कम्युनिटी रेडियो का दायरा बेहद छोटा होने के बावजूद भी विकास की दौड़ में अपनी अहम भूमिका निभाता है। छोटे समूह को लक्षित कर उनसे उनकी भाषा में उनके लिए विकास की बात करने का कार्य शायद ही कोई संचार माध्यम कर रहा हो। नब्बे के दशक से भारत में सामुदायिक रेडियो का आगमन हुआ और आरंभ में खासकर शैक्षणिक संस्थाओं से इसकी शुरूआत हुई और 2006 में भारत सरकार की एक नई नीति के तहत गैर.सरकारी संगठनों और दूसरी सामाजिक संस्थाओं को भी सामुदायिक रेडियो शुरू करने की इजाजत दी गई जिसके फलस्वरूप आज इस समय भारत में तकरीबन २०० सामुदायिक रेडियो स्टेशन खुल चुके हैं जो 34 भाषाओं में कार्य कर रहे हैं। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि अब सामुदायिक रेडियो धीरे.धीरे एक नए जमाने का मीडिया का रूप लेता जा रहा हैए जो समाज में जागरूकता फैलाने में एक सशक्त और कारगर माध्यम के तौर पर इस्तेमाल हो रहा हैए खासकर शिक्षा के क्षेत्र में।

बदला रेडियो सेट- बड़े रेडियो से स्मार्टफोन रेडियो तक
शुरुआत में पुराने आकार के बड़े रेडियो हुआ करते थे। इनकी नॉब घुमाकर रेडियो चैनल बदले जाते थे। अब रेडियो डिजिटल हो गयाए स्मार्टफोन पर ऑटो ट्यून हो जाता है। एक क्लिक पर ही सारे चैनल सर्च हो जाते हैं। लेकिन पुराने नॉब रेडियो का मजा ही कुछ और होता था। एनालॉग से शुरू हुआ रेडियो अब डिजिटल हो गया है। मीडियम वेवए शार्ट वेव से होकर एफएम तक पहुंच गया है। लेकिन रेडियो की लोकप्रियता जनसंख्या के साथ बढ़ती ही जा रही है। रेडियो मनोरंजन के साथ.साथ वैश्विक खबरों और आपातकाल में भी काफी उपयोगी साबित हुआ है।

एक नजर में रेडियो
1920 में भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत
1923 में मुंबई के रेडियो क्लब की ओर से पहला कार्यक्रम प्रसारित
1927 में मुंबई और कोलकाता में निजी स्वामित्व वाले दो ट्रांसमीटरों से प्रसारण सेवा की स्थापना
1930 में सरकार ने इन ट्रांसमीटरों को अपने नियंत्रण में लिया
1936 में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो किया गया
1942 में उन्होंने जर्मनी में ही आजाद हिंद रेडियो की स्थापना कीए जो बाद में सिंगापुर और रंगून से भारतीयों के लिए क्रांतिकारी समाचार प्रसारित करता रहा।
१४ या २७ अगस्त 1942 को नेशनल कांग्रेस रेडियो का प्रसारण शुरू हुआ १२ नवंबर १९४२ तक चला।
1946 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद एआईआर को सूचना व प्रसारण विभाग के अधीन कर दिया गया।
1947 में आजादी के समय भारत में कुल 6 रेडियो स्टेशन मुंबईए कोलकाता दिल्ली चेन्नईए लखनऊ और चंडीगढ़ काम कर रहे थे।
तीन अक्टूबर 1957 को विविध भारती का आगमन हुआ। वर्तमान में विविध भारती के 43 केंद्र है।
1957 से ऑल इंडिया रेडियो को आकाशवाणी के नाम से भी पुकारा जाने लगा।
आज रेडियो स्टेशन की संख्या सवा दो सौ से भी अधिक हो गई है। इस समय रेडियो की पहुंच 9९ फीसदी भारतीय जनता तक है।
1959 में टेलीविजन के शुरुआत होने के पहले तक भारत में रेडियो ही सबसे अधिक पहुंच वाला सर्वसुलभ जनमाध्यम था।
1993 से निजी कंपनियों को लीज पर टाइम स्लॉट देने की शुरुआत हुई।
15 अगस्त 1993 में देश में मुंबई से स्वतंत्र एफएम चैनल की शुरुआत हुई।
1995 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि रेडियो तरंगों पर सरकार का एकाधिकार नहीं हो सकता।
1997 में आकाशवाणी को टेलीविजन के साथ प्रसार भारती के अधीन कर दिया गया।
2002 में शिक्षण संस्थाओं को कैंपस रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति मिली।
16 नवंबर 2006 को स्वयंसेवी संस्थाओं को रेडियो स्टेशन खोलने की इजाजत दी गई।

कुछ प्रमुख भाषणए सूचनाओं और नारों का गवाह बना रेडियो


1930 में महात्मा गांधी ने रेडियो के जरिए देशवासियों को सत्य.अहिंसा का ज्ञान दिया
नवंबर 1941 में रेडियो जर्मनी से भारतवासियों के नाम संदेश में तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा का नारा दिया।
15 अगस्त 1947 को पंण् जवाहरलाल नेहरू ने देश में आजादी की घोषणा सार्वजनिक की
30 अगस्तए 1948 को महात्मा गांधी की हत्या की सूचना भी रेडियो के जरिए देशवासियों को मिली
20 नवंबरए 1962 को चीन के हमले के वक्त पंडित नेहरू ने देशवासियों के साथ खुलकर बात की
1965 में इंदिरा गांधी ने आबादी नियंत्रणए अनाज की कमी के मुद्दे पर अपनी बात जनता के सामने रखी
25 जूनए 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रेडियो के जरिए देश में आपातकाल लगाए जाने की घोषणा की थी।
25 जून 1 9 83 को भारत ने प्रूडेंशियल विश्व कप क्रिकेट का विजेता बना। तब सभी लोगों ने विश्वकप के पूरे मैच का आंखों देखा हाल रेडियो पर ही सुना था
31 अक्टूबर 1 9 84 इंदिरा गांधी पर अंगरक्षकों द्वारा किए गए हमले की जानकारी भी रेडियो से मिली और बाद में उनकी हत्या की सूचना भी रेडियो से मिली
21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या की सूचना भी लोगों ने रेडियो से सुनीए लेकिन तब तक टीवी भारत में सूचना का बड़ा माध्यम बन चुका था।

एफएम रेडियो
अब छोटे-छोटे रेडियो स्टेशन खोलना काफी आसान हो गया है। एफएम यानी फ्रीक्वेंसी मॉडयूलेशन तकनीक ने रेडियो जगत में क्रांति लेकर आई। 50 हजार से 5.10 लाख तक आबादी के लिए 50 से 80 किलोमीटर की दूरी तक के लिए होने वाले एफ एम प्रसारण इन दिनों बेहद लोकप्रिय हो गया है। सिर्फ बड़े शहरों में ही नहींए छोटे शहरों में भी इसने अपने लोकप्रियता के झंडे गाड़ दिए। इसका एक कारण तो यह भी है कि इसे स्थापित करने में काफी कम लागत आती है। साथ ही कम श्रमशक्ति में इसे एक कमरे में खोला जा सकता है। रेडियो केन्द्र खोला जा सकता है। आज देश के अनेक महानगरों में एक से अधिक एफएम चैनल प्रसारित हो रहे हैं। इन चैनलों का प्रसारण महानगरों में कारों से घर से दफ्तर जाने वाले लोगों के बीच भी बहुत लोकप्रिय है। ऐसे लोग सफर में बीच के समय एफएम रेडियो के जरिए संगीत का भी आनंद लेते हैं।

निजी एफएम ने लक्षित किया युवाओं को
निजी एफएम रेडियो आकाशवाणी की तरह बहुत औपचारिक नहीं हैं इसलिए ये कार्यक्रमों के बीच.बीच में चुटकलेए फिल्मी बातें और जरूरी सूचनाएं भी देते रहते हैं। इसके अलावा वह करियर और लव गुरु जैसे प्रोग्राम्स के जरिये सीधे युवाओं को आकर्षित करते हैं। इस तरह बाजारवाद के बाद बिंदास लाइफ जीने युवाओं को उन्होंने अपनी ओर पूरी तरह आकर्षित कर लिया है। दूसरी एक बात और हैए वह यह कि महानगरों में ट्रैफिक जाम की समस्या भयानक है। ऐसी हालत में जाम में फंसे लोगों को बोरियत से भी यह बचाती है। इन कारणों से एफएम बहुत तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है। कहां किस रोड में जाम लगा हैए इसकी सूचना भी श्रोताओं को एफएम से मिल जाती हैं। शहर में चल रही किसी प्रदर्शनीए किसी समारोह या किसी सेल आदि के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है। खेल लवर्स को वह बीच.बीच में खेलों की जानकारी भी देती रहती है। इस कारण लोग इससे खुद को आसानी से कनेक्ट कर पा रहे हैं।

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन
कुछ समय पहले जाकर याद करिए जरा। खासकर बुजुर्गों से बात करिए। वह आपको बिनाका गीत माला के किस्से सुनाएंगे और तबस्सुम तथा अमीन सयानी की दिलकश आवाज के बारे में बताएंगे। जसदेव सिंह की १५ अगस्त और २६ जनवरी की रनिंग कमेंट्री ऐसी रनिंग कमेंट्री के बारे में सुनाएंगेए जैसे घर पर बैठकर रेडियो पर नहींए बल्कि लालकिला और जनपथ पर जाकर उन्होंने वह कार्यक्रम देखा हो। रवि चतुर्वेदी की क्रिकेट के आंखों देखा हाल में उसके हिंदी ज्ञान की याद दिलाएंगेए तो यह भी बताएंगे कि सुशील दोषी की रनिंग कमेंट्री थाम्पसन की गेंद की रफ्तार से तेज होती थीए यह भी बताएंगे। यकीनन बुजुर्गों से रेडियो के रोचक संस्मरण सुनने के बाद आपके भी मुंह से निकलेगा कि कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिनण्ण्ण्।


एक नजर विश्व रेडियो दिवस पर
13 फरवरी की तारीख जन संचार के इतिहास की एक अहम तारीख है। यूनेस्को ने साल 2011 में इस दिन को विश्व रेडियो दिवस के रूप में मनाने की पेशकश की थी। शिक्षा के प्रसारए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक बहस में रेडियो की भूमिका को रेखांकित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिकए वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन ;यूनेस्कोद्ध ने यह घोषणा की। 13 फरवरी को संयुक्त राष्ट्र रेडियो की वर्षगांठ भी है। अमरीका में 1946 में इसी दिन रेडियो की शुरुआत हुई थी। आज विश्व की 95 प्रतिशत जनसंख्या तक रेडियो की पहुंच है और यह दूर.दराज के समुदायों और छोटे समूहों तक कम लागत पर पहुंचने वाला संचार का सबसे सुगम साधन है।

भारत में रेडियो का इतिहास
भारत में पहली बार रेडियो का प्रसारण 1923 में पहले कोलकाता के एक क्लब ने और फिर जूनए 1923 में टाइम्स ऑफ इंडिया व डाक व तार विभाग के संयुक्त प्रयास से मुंबई के एक रेडियो क्लब ने किया। इसके बाद 31 जुलाई 1924 से मद्रास प्रेसीडेंसी रेडियो क्लब नियमित रूप से अपने सदस्यों के लिए हल्के.फुल्के मनोरंजक कार्यक्रम प्रस्तुत करने लगा। 1 मार्च 1926 को एक एग्रीमेंट के तहत इंडियन ब्रॉडकॉस्टिंग कंपनीष् को रेडियो स्टेशन शुरू करने अनुमति मिली। लेकिन भारत में रेडियो की औपचारिक शुरुआत 23 जुलाईए 1927 से मानी जाती हैए जब मुंबई में पहले रेडियो स्टेशन का तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन ने उद्घाटन किया। इसी क्रम में 26 अगस्तए 1927 को कोलकाता स्टेशन की शुरुआत हुई। इसके बाद धड़ाधड़ कई रेडियो क्लब शुरू हुए।
1930 में इंडियन ब्रॉडकॉस्टिंग कंपनी दिवालिया हो गई इस कारण सरकार ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया और ष्भारतीय प्रसारण सेवा इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस.आईएसबीएस के नाम से उन्हें परिचालित करना आरंभ कर दिया। 5 मई 1932 को इसे सुचारू तरीके से चलाने के लिए ष्इंडियन वायरलेस टेलीग्राफी एक्टष् लागू किया गया। आठ जून 1936 को इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियोष् एआईआर कर दिया गया। इसके बाद धीरे.धीरे भारत के प्रमुख शहरों में रेडियो केंद्र खोले गए। इसी साल से देश में दैनिक समाचार बुलेटिनों का प्रसारण प्रारंभ हुआ।

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