
नई दिल्ली। जब हम अपने घर में बैठकर विकास पैर लेक्चर देते रहते हैं तब वहां गांव में कोई जिंदगी से जद्दोजेहद कर रहा होता है और शहरों में बैठकर 'विकास' के नाम का फल चख रहे होते हैं और बांट भी रहे होते हैं, दूसरी ओर हमारे गांवों की स्थिति उनसे कई बुरी और बद्दतर होती है। यहां आधुनिक भारत से आशय सिर्फ शहरी आबादी से है लेकिन जब हम गांव की ओर जाते हैं तो पाते हैं कि यहां तो बिजली तक नहीं है। इसी के साथ-साथ, अभी भी कुछ अच्छे लोग हैं जो समाज में बदलाव के लिए खुद आगे आते हैं, और कुछ ऐसे हैं जो किसी के आगे आने का इंतजार करते हैं। इन्हीं में से एक उदाहरण हैं ऋतू जैसवाल जिन्होंने अकेले बिहार के सिंघ्वाहिनी गांव के विकास के लिए काम किया है।
पिछले कुछ सालों से ऋतू जैसवाल इस बदहाल और बाढ़ पीड़ित गांव की तरक्की के लिए काम कर रही हैं। उनकी शादी अरुण कुमार से हुई है जो दिल्ली में एक आईएएस अधिकारी के तौर पर नियुक्क्त हैं। 40 साल की ऋतू दो बच्चों की मां हैं, वे सिंघ्वाहिनी की तरक्की के लिए दिल्ली के आरामदेह जीवन को छोड़ गांव में रहने लगी। बिहार के वैशाली में जन्मी ऋतू अपने युवा अवस्था से ही सामाजिक कार्यों के प्रति उत्साही थी। अपनी शादी के कुछ ही साल बाद जब उन्होंने अपने ससुराल की पैत्रिक गांव सीतामढ़ी के सोन्बरशा ब्लॉक का दौरा किया तो वहां की स्थिति देख वे बहुत ही निराश हो गई। वहां ना तो बिजली थी, ना अच्छी सड़क, ना साफ़-सफाई और ना ही पीने के लिए साफ पानी।
इसके बाद वे रोज इस गांव में जाने लगी और सबसे पहले उन्होंने वहां की शिक्षा में सुधार पर काम करना शुरू किया। गांव की एक युवा महिला अपनी बी.एड. की पढ़ाई पूरी करने के बाद बोकारो में नौकरी कर रही थी। ऋतू ने उनसे सिंघ्वाहिनी गांव में पढ़ाने का आग्रह किया और उन्हें खुद के खर्च से हर महीने वेतन देने की बात कही। वे महिला इस काम के लिए तैयार हो गई और उन्होंने गांव के उन 25 लड़कियों को पढ़ना शुरू किया जिन्होंने किसी कारणवश स्कूल जाना छोड़ दिया था। ऋतू की मेहनत रंग लाई और उसी साल 25 में से 12 लड़कियों ने अपनी मैट्रिक की परीक्षा 2015 फ्लाइंग कलर्स से पास की।
इसके बाद ऋतू ने गांव में लोगों से मिलना शुरू किया और उनसे खुले में शौच, घरेलू हिंसा, महिला शिशु-हत्या और जैविक खेती जैसे मुद्दों पर बात करना शुरू किया। एक के बाद एक समस्या सुलझाने के बाद ऋतू अब अपने दिल्ली वाले घर से ज्यादा इस गांव को वक्क्त देने लगीं। यह फैसला उन्होंने तब लिया जब उन्हें लगा कि गांव को बदलने के अपने सपने को अगर उन्हें पूरा करना है तो उन्हें गांव को ज्यादा से ज्यादा समय देना पड़ेग। इस काम के लिए उन्हें अपने परिवार से भी पूरा समर्थन मिला और फिर वे गांव चली गई। उनके परिवार के सदस्यों को जब उनसे मिलना होता है तो वो गांव चले जाया करते हैं। अपने परिवार के इन शब्दों से ऋतू को साहस मिला जिसकी उन्हें जरूरत थी और इसी कारण वे गांव में रहने जैसा बड़ा फैसला ले पाने में सक्षम हो पाई।
साल 2016 में, सिंघ्वाहिनी गाँव के लोगों ने उनसे आग्रह किया कि वे गाँव के मुखिया के पद पर चुनाव लड़ें। उन्होंने ऐसा किया भी और वे इस चुनाव को एक बड़े अंतर के साथ जीती (उन्हें 72% वोट मिला)। चुनाव जितने के बाद ऋतू ने गांव में सड़क बनवाने के लिए सरकारी अनुदान के लिए इंतजार करने के बजाये अपने पैसों से सड़क बनवाना शुरू किया। शुरुआत में उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ा लेकिन जब वहां के गांव वालों ने भी उनके इस प्रयास को सराहा और तो और गांव वालों ने अपनी ज़मीन सड़क बनवाने के लिए दे दी।
Published on:
18 Jan 2018 02:35 pm
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