
अमृतसर: बदला गया स्वर्ण मंदिर का 200 साल पूराना दरवाजा
नई दिल्ली। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर देश के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। यहां की खूबसूरती देखने लोग देश, विदेश से आते हैं। स्वर्ण मंदिर का दरवाजा भी अपनी खास पहचान रखता है। इसका दरवाजा 200 साल पूराना है। शनिवार को इस दरवाजे को बदल कर दूसरा नया दरवाजा लगाया गया है।
चारों दिशाओं में खुलते हैं दरवाजे
बता दें कि लगभग 400 साल पुराने इस गुरुद्वारे का नक्शा खुद गुरु अर्जुन देव ने तैयार किया था। यह स्वर्ण मंदिर शिल्प सौंदर्य की अनूठी मिसाल है। गुरुद्वारे के चारों ओर दरवाजे हैं, जो चारों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) में खुलते हैं। उस समय भी समाज चार जातियों में विभाजित था और कई जातियों के लोगों को मंदिरों में आने-जाने की इजाजत नहीं थी, लेकिन इस गुरुद्वारे के यह चारों दरवाजे उन चारों जातियों को यहां आने के लिए आमंत्रित करते थे। यहां हर धर्म के अनुयायी का स्वागत किया जाता है। वहीं, इनमें से एक द्वार गुरु राम दास सराय का है। इस सराय में अनेक विश्राम-स्थल हैं। विश्राम-स्थलों के साथ-साथ यहां चौबीस घंटे लंगर चलता है, जिसमें कोई भी प्रसाद ग्रहण कर सकता है।
स्वर्ण मंदिर का इतिहास
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की स्थापना 1574 में चौथे सिख गुरू रामदासजी ने रखी थी। यह गुरूद्वारा अमृतसर शहर के एकदम बीच में स्थित है। इसे स्वर्ण मंदिर, हरिमन्दिर साहिब और दरबार साहिब जैसे कई नामों से जाना जाता है। यह गुरूद्वारा अमृतसर शहर के बिलकुल बीच में स्थित है। महाराजा रणजीत सिंह ने स्वर्ण मंदिर के लिए कई किलो सोना दान में दिया था। बता दें कि स्वर्ण मंदिर में चारों तरफ सरोवर फैला हुआ है, जिसे अमृत सरोवर के नाम से जाना जाता है। यहां दुनिया का सबसे विशाल लंगर लगता है, जिसमें कई हाजार लोग शामिल होते हैं। इसकी इतनी महत्ता है कि ब्रिटिश सरकार ने भी प्रथम विश्व युद्ध के समय यहां आकर अखंड ज्योत का पाठ करवाया था।
मुसलमान ने रखी थी स्वर्ण मंदिर की नीव
वैसे तो यह गरुद्वारा सिखों का गुरुद्वारा है, लेकिन इसके नाम में मंदिर शब्द का जुड़ना यह बताता है कि भारत में सभी धर्मों को एक समान माना जाता है। इतना ही नहीं, श्री हरमंदिर साहिब की नींव भी एक मुसलमान ने ही रखी थी।
Published on:
06 Oct 2018 03:45 pm
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