
कोरोनाकाल- मौलिक कर्तव्यों को याद रखने का वक्त
नरपत दान बारहठ, टिप्पणीकार
संविधान में वर्णित मूल कर्तव्यों का पालन करना सभी नागरिकों का कर्तव्य है।लेकिन धरातल पर मूल कर्तव्यों के प्रति गंभीरता दिखाई नहीं देती। हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद एकलपीठ के न्यायाधीश पी बी वराले ने कोरोना वायरस महामारी के बीच सामने आ रही कठिनाइयों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए एक याचिका पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी की है कि जहां सरकारी तंत्र से कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए प्रभावी कदम उठाने की अपेक्षा की जाती है, वहीं नागरिकों से भी उनके मौलिक कर्तव्य याद रखने की अपेक्षा की जाती है। जस्टिस ने इस दौरान कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 51 ए को पढ़ा और टिप्पणी करते हुए कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें दिशानिर्देश और अधिसूचनाएं जारी करके लोगों से भीड़भाड़ और सामूहिक कार्यक्रमों में जाने से बचने तथा सामाजिक दूरी बनाकर रखने को कह रही हैं। लेकिन कुछ नागरिक अब भी इन निर्देशों का उल्लंघन कर रहे हैं और कुछ नागरिक तो सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने में शामिल हैं।
ऐसे हालात में यह हमारे लिए एक नागरिक के तौर पर मौलिक कर्तव्यों को याद रखने का समय है। नागरिक अपने मौलिक अधिकारों के लिए अकसर गंभीर चिंता प्रकट करते हैं, लेकिन मौलिक कर्तव्यों को भूल जाते हैं। इस टिप्पणी के साथ यहां यह महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है कि किसी भी राष्ट्रीय संकट के समय सभी नागरिकों को अपने मूल कर्तव्य याद रखने बहुत जरूरी है। महामारी के राष्ट्रीय संकट के समय नागरिकों का यह मूल कर्तव्य है कि देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे और भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है तथा प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे।वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे एवं व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छूएं।
अक्सर यह देखा जाता है कि लोगों द्वारा व्यक्तिगत एवं सामूहिक गतिविधियों में अलग-अलग व्यवहार किया जाता है जबकि जरूरी है कि दोनों गतिविधियों में सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें। लेकिन चिंतनीय बात है कि जब केंद्र और राज्य सरकारें बार बार आगाह कर रही है कि सभी लोग घर में ही रहे। यात्रा करने से बचें । थोड़ी तकलीफ उठानी पड़ेगी, यह आपके स्वास्थ्य और देश के लिए करना ही पड़ेगा। लेकिन फिर भी देखने में आ रहा है सोशल मीडिया के फेक दौर में कई असामाजिक तत्व सोशल डिस्टेंस को छुआछूत का रंग दे रहे है, तो कई धार्मिक रूप से बांटकर उन्माद फैलाने का दुस्साहस कर रहे है। वहीं कुछ लोग बेवजह ट्रैवल पास बनाकर गाडियां लेकर घूम रहे है।राशन की कमी की अफवाहों का शिकार होकर दुकानों में भीड़ बना कर खड़े है। बैंक में ,सब्जी मंडी में लंबी लाइनें लगी है। यह सब करके लोग अपना कर्तव्य भूल रहे है। ऐसी आपात स्थिति में जरूरी है कि इनको मौलिक कर्तव्य याद दिलाए जाएं।
मूल कर्तव्यों के अध्याय के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं का आदर करे। इसी तरह, इन कर्तव्यों में भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना और इसे अक्षुण बनाये रखना और देश की रक्षा करना तथा आह्वाहन किये जाने पर राष्ट् की सेवा करना भी शामिल है। मूल कर्त्तव्य भारत के नागरिकों में अपनी संस्कृति, राष्ट्र-प्रेम की भावना और समाज को प्रगतिशील बनाने वाले मूल्यों के प्रति उन्मुख और प्रोत्साहित करने में मददगार है।
गांधीजी ने कर्तव्यों को ही अधिकारों का स्रोत माना है। उन्होंने कहा था कि जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठा पूर्वक करता है उसे अधिकारों के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं रह जाती है। इस बात की समझ और इसका पालन अगर तय हो जाये तो हमारे संविधान का मर्म हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन जाएगा। गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों में भी मनुष्य के कर्तव्य वैभव को देखा जा सकता है। उसमें भी संविधान की आत्मा बोलती है। वर्तमान में भारत की प्रगति के लिए मौलिक कर्तव्यों के निर्वहन की आवश्यकता है। नागरिक अपने मौलिक अधिकारों के प्रयोग के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करेंगे तब तक हम भारतीय समाज को मजबूत नहीं कर पाएंगे।
जहां मौलिक अधिकार बताता है कि आप एक इंसान हैं, जबकि एक मौलिक कर्तव्य भी मनुष्य के रूप में आपकी ज़िम्मेदारी तय करता है। मौलिक अधिकार आपके लिए दी गई विशेषाधिकार पर आधारित है, जबकि मौलिक कर्तव्य जवाबदेही पर आधारित है। हमें अब यह तय करना है कि हम अपने अधिकारों से पहले अपने कर्तव्यों की बात करें। यही हमें और हमारे देश को उन्नति की राह पर ले जाएगा। यह सच है कि मौलिक कर्तव्य मूल संविधान का हिस्सा नहीं था और बाद में एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से इसे शामिल किया गया। लेकिन मौलिक कर्तव्य की बात या तो कोई करना नहीं चाहता या हम जान-बूझ कर नहीं करते। मतलब साफ है, हम पाना तो सबकुछ चाहते हैं लेकिन बदले में अपना दायित्व समझ कर कुछ करना नहीं चाहते।
हमें अपने मौलिक अधिकारों से पहले अपने मौलिक कर्तव्यों का पालन करना होगा। क्योंकि मौलिक कर्तव्य, देश के नागरिक के रूप में दिया जाने वाला मूलभूत उत्तरदायित्व है।विचार करना ही होगा कि हम मौलिक कर्तव्य की बात क्यों नहीं करना चाहते? हम जन सुविधाएं पाने के लिए अपने मौलिक अधिकारों की बात तो करते हैं लेकिन इन्हीं जन सुविधाओं को पा लेने के बाद इनके संरक्षण की बात हम क्यों नहीं करते? देखा जाए तो हम मौलिक अधिकारों को अपनी जागीर मानते हैं जबकि मौलिक कर्तव्यों को दूसरों के लिए छोड़ देते हैं। मतलब लेने का अधिकार हमारा और देने का किसी दूसरे का। यह सोच हमें विकसित होने नहीं दे सकती। दुनिया भर के कई देशों ने ‘जिम्मेदार नागरिकता’ के सिद्धांतों को मूर्त रूप देकर स्वयं को विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बदलने का कार्य किया है।
इस संबंध में संयुक्त राज्य अमेरिका को सबसे उत्कृष्ट उदाहरण माना जा सकता है। अमेरिका द्वारा अपने नागरिकों को ‘सिटिज़न्स अल्मनाक’ नाम से एक दस्तावेज़ जारी किया जाता है जिसमें सभी नागरिकों के कर्तव्यों का विवरण दिया होता है।मौलिक कर्तव्य देश के नागरिकों के लिये एक प्रकार से सचेतक का कार्य करते हैं। गौरतलब है कि नागरिकों को अपने देश और अन्य नागरिकों के प्रति उनके कर्तव्यों के बारे में ज्ञान होना चाहिये।ये असामाजिक गतिविधियों के विरुद्ध लोगों के लिये एक चेतावनी के रूप में कार्य करते हैं और राष्ट्र के प्रति अनुशासन और प्रतिबद्धता की भावना को बढ़ावा देने के साथ ही नागरिकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी मदद करते हैं।
गौरतलब है कि संविधान का अनुच्छेद 37 राज्य के नीति के निर्देशक सिद्धांतों को गैर-प्रवर्तनीय और गैर-न्यायसंगत बनाता है परंतु संविधान के अंतर्गत मौलिक कर्तव्यों के लिये ऐसा कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया है।संविधान के अंतर्गत इन मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के लिये भी कोई विशेष प्रावधान नहीं किये गए हैं।इसलिये इनके उल्लंघन पर तब तक किसी भी प्रकार का दंड नहीं दिया जा सकता जब तक संविधान में इसके लिये विशिष्ट प्रावधान न किया जाए। साथ ही मौलिक कर्तव्यों को संविधान में शामिल किये जाने के वर्षों बाद भी, नागरिकों में इसके संबंध में पर्याप्त जागरूकता की भी कमी देखी जाती है।
वर्तमान में भारत की प्रगति के लिये मौलिक कर्तव्यों के निर्वहन की आवश्यकता पर ज़ोर देना अनिवार्य हो गया है। जब तक नागरिक अपने मौलिक अधिकारों के प्रयोग के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करेंगे तब तक हम भारतीय समाज में लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत नहीं कर पाएँगे। मौलिक कर्तव्य की अवधारणा भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्रों के लिये महत्त्वपूर्ण है।
गौरतलब है कि 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने यह महसूस किया कि मौलिक अधिकारों के प्रति तो सभी जागरूक हैं लेकिन कर्तव्यों के प्रति संजीदगी नहीं है। इसका नतीजा यह हुआ कि सरदार स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिशों के मद्देनजर 1976 में संविधान में संशोधन करके मौलिक कर्तव्यों को ‘भाग 4-क’ में ‘मूल कर्तव्य’ शीर्षक से अनुच्छेद 51-क इसमें जोड़ा गया।मौलिक कर्तव्यों की अवधारणा को रूस के संविधान से लिया गया है।
वर्तमान में मौलिक कर्तव्यों की संख्या ग्यारह है। संविधान में मूल कर्तव्यों को शामिल करने का उद्देश्य नागरिकों को इसमें प्राप्त मौलिक अधिकारों के साथ ही उनकी जिम्मेदारियों से भी अवगत कराना था।सोचने वाली बात यह भी है कि केन्द्र और राज्य सरकारों तथा उनके तमाम विभागों ने यदि जनता को उनके मौलिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाने का प्रयास किया होता तो निश्चित ही आज सांप्रदायिक तनाव की स्थिति, नियमों और नागरिकों के हितों की अनदेखी करके हुये औद्योगीकरण तथा प्राकृतिक संसाधानों के अंधाधुंध दोहन से हुये प्रदूषण से बचने, पर्यावरण संरक्षण, अनधिकृत निर्माण, जल, जमीन, जंगल, वन्यजीवों और आदिवासियों की रक्षा के साथ ही तमाम अन्य समस्याओं का सामना करने के लिये देशवासी पूरी तरह तैयार होते।
Published on:
22 Apr 2020 01:41 pm
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