संघर्ष, रहस्य और रोमांचः चाय की दुकान वाला मदन पंडित यूं बन गया दाती महाराज

संघर्ष, रहस्य और रोमांचः चाय की दुकान वाला मदन पंडित यूं बन गया दाती महाराज

चंद सालों में एक चाय की दुकान चलाने से लेकर आलीशान जिंदगी तक पहुंचा दाती कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहा है। अब तक वह कई तरह के कामकाज कर चुका है।

नई दिल्ली। राजधानी के प्रसिद्ध शनिधाम मंदिर में पूजा करने वाला दाती महाराज आज दुष्कर्म के आरोपों के चलते फिर से सुर्खियों में है। लेकिन इस बाबा के जीवन की कहानी किसी हिंदी फिल्म से कम नहीं है। राजस्थान के पाली जिले में रहने वाला मदन मेघवाल कभी दो जून की रोटी के जुगाड़ में दिल्ली या था। इसके बाद जिंदगी संघर्ष, रहस्य और रोमांच के रास्तों से गुजरी। चंद सालों में एक चाय की दुकान चलाने से लेकर आलीशान जिंदगी तक पहुंचा दाती कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहा है। अब तक वह कई तरह के कामकाज कर चुका है।

...इतने कारोबार बदल चुका है दाती

महज सात साल की उम्र में मां और बाप दोनों को खो चुके दाती ने दिल्ली के फतेहपुरबेरी में मदनलाल पंडित के नाम से चाय की दुकान खोली थी। इसके बाद उसने पटरी-बल्ली और शटरिंग, ईंट-बालू और सीमेंट की दुकान, टेंट हाउस खोला फिर कैटरिंग का कामकाज भी किया। 1996 में उसकी मुलाकात एक ज्योतिषी से हुई थी, धीरे-धीरे उसने जन्म कुंडली देखने समेत ज्योतिष विज्ञान के कई काम सीख लिए। इसके बाद अपने पुराने कामकाज बंद करके लोगों को भविष्य बताने का काम शुरू कर दिया।

मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों में अच्छी पकड़

ज्योतिषी केंद्र खोलने के बाद उसने फतेहपुरबेरी में ही शनिधाम मंदिर बना लिया और धीरे-धीरे आसपास की जमीनों पर कब्जा करके आश्रम और ट्रस्ट बना लिए। वक्त बीतने के साथ-साथ दाती के भक्तों की संख्या हजारों-लाखों तक पहुंच गई। दाती के अनुयायियों की सूची में सियासत से प्रशासन तक की कई बड़ी हस्तियां शामिल हैं। केंद्रीय मंत्री से लेकर बड़े-बड़े सचिवों में उसकी अच्छी पैठ मानी जाती है।

...ऐसे बटोरीं दौलत-शौहरत

ज्योतिष बनकर दाती ने लोगों का भविष्य कितना सही बताया पता नहीं, लेकिन अपने भविष्य में दौलत और शौहरत दोनों लिख ली। दाती की शौहरत में चार चांद तब लगे जब उसने छोटे पर्दे पर आना शुरू कर दिया। टीवी पर उसका शो ने एक वक्त पर अच्छी खासी लोकप्रियता हासिल की थी। इसी बीच हरिद्वार महाकुंभ में पंचायती महानिर्वाण अखाड़े ने दाती महाराज को महामंडलेश्वर की उपाधि दे दी। इसके बाद उसने शनि मंदिर को श्री सिद्ध शक्तिपीठ शनिधाम पीठाधीश्वर और खुद को श्रीश्री 1008 महामंडलेश्वर परमहंस दाती जी महाराज नाम दे दिया।

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