
जॉर्ज फर्नांडिस : राजद्रोह के अभियुक्त से भारत के रक्षा मंत्री तक का सफर
नई दिल्ली। भारतीय राजनीति के एक निडर शख्स का आज 88 की उम्र में निधन हो गया। लेकिन वो अपने पीछे ढेरों यादें छोड़ गए हैं। 16 साल की उम्र में पादरी की शिक्षा लेने वाले जॉर्ज का उसमें मन नहीं रमा तो वो मुम्बई मंगलुरू से बंबई पहुंच गएा यहां पर नौकरी करते हुए ट्रेड यूनियन में शामिल हो गए। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वो उस समय छा गए जब 1967 में उन्होंने बंबई दक्षिण लोकसभा सीट से कांग्रेस के कद्दावर नेता एसके पाटिल चुनावी मात देने में सफल रहे। उसके बाद आपातकाल का विरोध किया और इसी दौरान कुछ ऐसी घटनाएं घटी कि उन पर राजद्रोह का मुकदमा भी चला। लेकिन वो जेल से ही मुजफ्फपुर से चुनाव ल्रड़कर देश भर में छा गए।
पाटिल को हराकर बंबई के शेर बने जॉर्ज
बात 1967 के समय की है। एक नामचीन पत्रकार से जॉर्ज का नाम लेते हुए बातचीत में तत्कालीन कांग्रेस नेता एसके पाटिल से पूछा कि आपके खिलाफ बंबई का बेताज बादशाह चुनाव लड़ने जा रहा है। इस पर उन्होंने बयान दिया कि मुझे दक्षिण मुंबई से भगवान भी नहीं हरा सकता। उन्होंने कहा कि पाटिल ने उलटे मुझ ही पर सवाल दाग दिया कि ये कौन है जॉर्ज फर्नांडिस? अगले दिन बंबई के सारे अख़बारों की हेड लाइन थी, 'ईवेन गॉड कैन नॉट डिफीट मी, सेज़ पाटिल।" उसी एक टिप्पणी पर जॉर्ज फ़र्नांडिस ने पोस्टर छपवाए, "पाटिल कहते हैं, भगवान भी नहीं हरा सकते उनको। लेकिन आप हरा सकते हैं इस शख़्स को।"ये शुरुआत थी पाटिल के पतन की और जॉर्ज के उदय की। उसी चुनाव में जॉर्ज फर्नांडिस ने पाटिल को 42 हज़ार वोटों से चुनावी मात दे दी। इसी के साथ जॉर्ज का नाम बंबई का शेर पड़ गया।
जॉर्ज को हरा नहीं पाई इंदिरा
जॉर्ज फर्नांडिस को दूसरी बार राष्ट्रीय स्तर पर सुखियों में तब छा गए जब उन्होंने अपने बूते पर पूरे भारत में रेल हड़ताल करवाई। आजादी के बाद तीन वेतन आयोग आ चुके थे, लेकिन रेल कर्मचारियों के वेतन में कोई दर्ज करने लायक इजाफा नहीं हुआ था। उसी समय जॉर्ज नवंबर, 1973 को ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन के अध्यक्ष बने और यह तय किया गया कि वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल की जाए। हड़ताल का उन्होंने बिगुल फूंक दिया। इस हड़ताल में 13 लाख कर्मचारी शामिल हुए। रेल सेवा ठप हो गया। हड़ताल में टैक्सी ड्राइवर, इलेक्ट्रिसिटी यूनियन और ट्रांसपोर्ट की यूनियनें भी शामिल हो गईं। मद्रास की कोच फ़ैक्ट्री के दस हजार मजदूर भी हड़ताल के समर्थन में सड़क पर आ गए। गया में रेल कर्मचारियों ने अपने परिवारों के साथ पटरियों पर कब्जा कर लिया। एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक हड़ताल तोड़ने के लिए 30,000 से ज्यादा मजदूर नेताओं को इंदिरा गांधी ने जेल में डाल दिया। इंदिरा गांधी ने बेरहमी से इस हड़ताल को कुचलने की कोशिश की। लेकिन इसका जॉर्ज पर असर नहीं पड़ा और मजदूरा की जीत हुई।
मैं, अपने ही देश में शरणार्थी बन गया हूं
इसके बाद 25 जून, 1975 को जब आपातकाल की घोषणा हुई तो जॉर्ज फर्नांडिस इंदिरा गांधी के निशाने पर थे। जिस समय आपातकाल की घोषणा हुई फर्नांडिस रात के 11 बजे तक प्रतिपक्ष के कार्यालय में ही सो गए। अगले दिन सुबह साढ़े पांच बजे उन्होंने भुवनेश्वर की फ्लाइट ली। वहां जाकर ही उन्हें पता चला कि देश में इमरजेंसी लग गई है। वो भुवनेश्वर एयरपोर्ट से कार से दिल्ली आए और अपने एक पत्रकार दोस्त के घर पहुंचे। उन्होंने अपने दोस्त से कहा कि मैं कुछ दिन तुम्हारे साथ रहूंगा। उसके बाद जॉर्ज दिल्ली से बड़ौदा गए। आपातकाल घोषित होने के डेढ़ महीने बाद जॉर्ज अचानक बड़ौदा अपने दोस्त के घर एक सरदारजी के भेष में पहुंचे। वहां पहुंचने के बाद जॉर्ज ने एक बहुत मार्मिक वाक्य कहा था कि 'आपातकाल की वजह से मैं अपने ही देश में शरणार्थी बन गया हूँ।' इसके बाद जब जॉर्ज को कोलकाता के एक चर्च में गिरफ्तार किया तो उसी रात उन्हें गुपचुप रूसी फौजी जहाज इल्यूशिन से दिल्ली ले जाया गया और तिहाड़ जेल में रखा गया।
जनता सरकार में बने मंत्री
1977 में जब चुनाव की घोषणा हुई तो जॉर्ज ने जेल में रहते हुए ही मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ने का फैसला किया। 1977 के जनता मंत्रिमंडल में जॉर्ज को पहले संचार मंत्री बने और फिर उद्योग मंत्री बनाया गया। जब जनता पार्टी में टूट शुरू हुई तो उन्होंने संसद में मोरारजी देसाई का ज़बरदस्त बचाव किया। लेकिन 24 घंटे के अंदर वही जॉर्ज चरण सिंह के खेमे में पहुंच गए। इस राजनीतिक सोमरसॉल्ट से जॉर्ज की खासी किरकिरी हुई और उस पर तुर्रा ये हुआ कि चरण सिंह ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल तक में नहीं लिया।
लैला कबीर की बेटी से शादी और जया से मुलाकात
राजनीति के इस भागदौड़ में नेहरू के मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री रहे हुमायूं कबीर की बेटी लैला कबीर से जॉर्ज की मुलाकात 1971 में कोलकाता से दिल्ली आते हुए इंडियन एयरलाइंस की एक फ्लाइट में हुई थी। दिल्ली पहुंचने पर जॉर्ज ने लैला को उनके घर छोड़ने की पेशकश की थी, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया था। लेकिन तीन महीने बाद जॉर्ज ने उनके सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। इसमें चौंकाने वाली बात ये है कि उनकी शादी में राजनीतिक रूप से उनकी धुर-विरोधी इंदिरा गांधी भी शामिल हुई थीं। 1984 आते-आते जॉर्ज और लैला के संबंधों में दरार पड़नी शुरू हो गई थी। इस बीच 1977 में जॉर्ज फर्नांडिस की मुलाकात पहली बार जया जेटली से हुई। उस समय वो जनता पार्टी सरकार में उद्योग मंत्री थे। 1984 आते-आते जॉर्ज जया ने अपने निजी दांपत्य जीवन की बातें भी बांटने लगे और बाद में एक-दूसरे के करीबी हो गए।
समता पार्टी का गठन
राजनीतिक उतार-चढ़ावों के बीच जब वीपी सिंह पीएम बने तो उन्होंने अपनी सरकार में जॉर्ज फर्नांडिस को रेल मंत्री बनाया। उसी समय कोंकण रेलवे की नींव रखी और दुनिया को चौंका देने वाली ये रेल परियोजना पूरी हुई। 1994 में जनता दल छोड़कर समता पार्टी का गठन कर लिया था। इसके बाद फिर 1999 में एक बार और जनता दल का विभाजन हो गया। इस दौरान कुछ नेता जॉर्ज फर्नांडिस की समता पार्टी के साथ मिल गए और पार्टी का नाम जनता दल यूनाईटेड (जेडीयू) हो गया। बाकी बचे नेताओं ने एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व में जनता दल (सेक्युलर) का गठन किया।
एनडीए सरकार ने बने रक्षा मंत्री
1998 तक आते आते उनकी पार्टी का गठबंधन भाजपा से हुआ और भाजपा के प्रमुख सहयोगी बन गए। वो एनडीए के संयोजक भी रहे। वाजपेयी ने जॉर्ज फर्नांडिस को रक्षा मंत्री बनाया। उन्हीं के समय में दूसरा पोखरण विस्फोट हुआ। वह 1998 से 2004 तक रक्षा मंत्री का पद संभाला था। पाकिस्तान के साथ कारगिल युद्ध और पोखरण में न्यूक्लियर टेस्ट के दौरान फर्नांडिस ही रक्षा मंत्री थे।
Updated on:
29 Jan 2019 09:38 pm
Published on:
29 Jan 2019 03:03 pm
बड़ी खबरें
View Allविविध भारत
ट्रेंडिंग
