12 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

महान समाजसेवी बाबा आमटे को गूगल ने दी श्रद्धांजलि, कुष्ठ रोगियों के लिए कर दिया था जीवन समर्पित

बाबा आमटे महात्मा गांधी और विनोभा भावे से काफी प्रभावित थे। वह जिंदगी भर महात्मा गांधी के विचारों पर चलते रहे।

3 min read
Google source verification
Baba Amte

महान समाजसेवी बाबा आमटे को गूगल ने दी श्रद्धांजलि, कुष्ठ रोगियों के लिए कर दिया था जीवन समर्पित

नई दिल्ली। बाबा आमटे के नाम से मशहूर डॉ. मुरलीधर देवीदास आमटे की आज 104वीं जयंती है। प्रख्यात समाजसेवी डॉ. मुरलीधर देवीदास आमटे को उनकी जयंती पर गूगल ने डूडल बनाकर श्रद्धांजलि दी है। स्लाइड शो में आमटे के जीवन और विरासत के बारे में बताया गया है। बाबा आमटे ने अपना पूरा जीवन जन सेवा को समर्पित किया, खासकर उन्होंने कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के लिए बहुत काम किया। समाज से परित्यक्त लोगों और कुष्ठ रोगियों के लिये उन्होंने अनेक आश्रमों और समुदायों की स्थापना की।

गांधी बनकर सड़कों पर दो साल से मदद मांग रहा था बुजुर्ग किसान, हाईवे पर रौंद कर चली गई कार

चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए आमटे
आमटे एक अमीर परिवार में पैदा हुए। उनके ठाठ-बाट बिल्कुल दौलतमंदों वाले थे। शिकार और स्पोर्ट्स कार का शौक रखने वाले बाबा आमटे किसी राजकुमार से कम नहीं थे। बचपन में ही मुरलीधर को अपना उपनाम बाबा दिया गया था। 26 दिसंबर 1914 को जमींदार देवीपाल के घर जन्मे आमटे ने नागपुर से कानून की पढ़ाई की। स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी उन्होंने काम किया। 1942 के भारत छोड़ों आन्दोलन में जिन भारतीय नेताओ को ब्रिटिश सरकार ने कारावास में डाला था उन सभी नेताओं का बचाव बाबा आमटे ने किया था। वह महात्मा गांधी और विनोभा भावे से काफी प्रभावित थे। वह जिंदगी भर महात्मा गांधी के विचारों पर चलते रहे। ब्रिटिश सैनिकों से एक लड़की की जान बचाने के बाद बापू ने आमटे को “अभय साधक” का नाम दिया। उन्होंने कुष्ठ रोगियों के लिए बहुत काम किया। उनका पूरा जीवन जन कल्याण को समर्पित था।

कुष्ठ रोगियों के लिए किया खूब काम
वकालत की पढ़ाई के दौरान उनकामन कहीं न कहीं समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए तड़पता रहता था। बाबा आमटे ने कुष्ठ रोगियों के लिए उस वक्त काम करना शुरू किया जब कुष्ठ रोगियों को देखते भी नहीं थे। उन्हे समाजिक कलंक समझा जाता था। बचपन से ही वह जातिवाद में विश्वास नहीं रखते थे। सभी को समान मानते।
एक दिन बाबा ने एक कोढ़ी को बारिश में भीगते हुए देखा उसकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। उन्होंने सोचा कि अगर अगर इसकी जगह मैं होता तो क्या होता? उन्होंने उसके बाद बाबा ने रोगी को उठाया और अपने घर की ओर चल दिए। इसके बाद बाबा आमटे ने कुष्ठ रोग को जानने और समझने में ही अपना पूरा ध्यान लगा दिया। बाबा ने अपना पसीना बहाकर कुष्ठरोगों से पीड़ित अछुतों के लिए आश्रम बनाया। जिसे आज आनंदवन ने नाम से जाना जाता है। 1949 में बाबा आमटे ने कुष्ठरोग से ग्रस्त लोगों के लिए महारोग सेवा समिति बनाई और तन-मन से उनकी सेवा में जुट गए। कुष्ठ रोगी बाबा को अपना भगवान मानते थे। वह अपने धर्मपत्नी से बहुत प्रेम करते थे। साधना आमटे उनके सामाजिक कार्यों में हमेशा साथ रहीं। उनते दो बेटे और उनकी पत्नी डॉक्टर थीं। उन्होंने सदैव सामाजिक कार्यो में अपना योगदान दिया और हमेशा वे अपने पिता के नक्शेकदम पर ही चलते रहे। 9 फरवरी 2008 में 94 की उम्‌र में वह इस दुनिया को छोड़कर दुनियाभर को प्रेरित करते हुए चले गए।

बाबा आमटे का कहना था , “मै एक महान नेता बनने के लिए काम नही करना चाहता, बल्कि मै तो जरूरतमंद गरीबो की सहायता करना चाहता हु।”
उन्होंने नर्मदा बचाओ आन्दोलन के लिए भी काम किया। उनके महान कार्यों के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। पद्म श्री ( 1971 ), रमन मेगसेसे अवार्ड (1985), पद्म विभूषण (1986), मानव अधिकार के क्षेत्र में अतुल्य योगदान के लिए यूनाइटेड नेशन प्राइज (1988), गाँधी शांति पुरस्कार (1999), सावित्रीबाई फुले अवार्ड (1998) समेत कई और प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया।


बड़ी खबरें

View All

विविध भारत

ट्रेंडिंग