
visaranai for oscar
मुंबई। पुलिस बर्बरता की 13 दिनों की कहानी ने एक उपन्यास का रूप लिया और इस पर बनाई गई एक मूवी। ये मूवी इंडिया की तरफ से फिल्मी दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कार ऑस्कर के लिए नामित की जाती है। ये लाइनें किसी मूवी का हिस्सा नहीं हैं बल्कि हकीकत में घटी एक घटना है। यह लगातार दूसरा साल है जब हिंदी फिल्म को ऑस्कर के लिए नहीं भेजा गया। इससे पहले पिछले साल मराठी फिल्म च्कोर्टज् को भेजा था।
तमिल फिल्म विसरनाई कोयंबटूर के ऑटो चालक एम. चंद्रकुमार के लिखे उपन्यास लॉक अप पर आधारित है। इस मूवी को भारत की ओर से 89वें एकेडमी अवार्ड में विदेशी भाषा फिल्म कैटेगरी में भेजा जाना तय हो गया है।
ये है उपन्यास के पीछे की रियल स्टोरी
ऑटो ड्राइवर चंद्रकुमार के मुताबिक 30 जून 1962 को मां-बाप के साथ वे कोयम्बूटर आ गए। इसके बाद 10वीं तक पढ़ाई की। फिर स्कूल नहीं गए। परिवार से झगड़ा हुआ और घर से भाग गया। बंजारे की तरह दक्षिण भारत के हिस्सों में भटकता रहा। आखिरकार हैदराबाद जाने के बाद गुंटूर के एक गांव में होटल में काम करना शुरू किया। चंद्रकुमार के यहां 2-3 दोस्त भी बन गए। वो भी छोटा-मोटा काम कर जीवनयापन करते थे।
चंद्रकुमार के मुताबिक ये बात साल 1983 की है जब मुझे तीन साथियों के साथ पुलिस ने शक के आधार पर गिरफ्तार कर लिया। मेरे तीनों साथी अल्पसंख्यक समुदाय से थे। पुलिस ने पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया और अत्याचार करने लगे। हमें मार्च की गर्मी में छोटे-छोटे कमरों में रखा जाता था। पुलिस जब चाहती जानवरों की तरह मारती थी। यह सिलसिला 13 दिनों तक चला।'
आपको बता दें कि कोयम्बटूर के ऑटो रिक्शा ड्राइवर एम. चंद्रकुमार (54 वर्षीय ) ऑटो चंद्रन के रूप में प्रसिद्ध हैं। वे 6 किताबें लिख चुके हैं। कुमार अपने गुंटुर जेल के अनुभव पर च्लॉक अप-2ज् नॉवेल लिख रहे हैं। वहीं दुष्कर्म पीड़िता की कहानी पर आधारित कुमार के नॉवेल च्वेप्पा मात्रा वेल्लोलियालज् पर भी फिल्म बन रही है।
Published on:
23 Sept 2016 03:56 pm
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