
India Recap 2018: ये रहे नजीर साबित होने वाले सुप्रीम कोर्ट के 12 अहम फैसले…
नई दिल्ली। साल 2018 की समाप्ति में अब पांच दिन शेष बचे हैं। नया साल दिल खोलकर स्वागत के लिए तैयार है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने किन-किन मामलों में ऐतिहासिक फैसले दिए। ऐसे कौन से फैसले हैं जो आने वाले वर्षों में सामुदायिक समानता और सशक्तिकरण की दिशा में नजीर साबित होंगे।
1. रफाल
सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर को रफाल सौदे पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मोदी सरकार को क्लीनचिट देने का काम किया। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों ने एकमत से अपने फैसले में रफाल सौदे को लेकर दायर सभी याचिकाएं खारिज कर दी और मोदी सरकार को पूरी तरह से क्लीन चिट दे दी। इस मुद्दे पर मोदी सरकार काफी समय से घिरी थी और विपक्ष ने इसे चुनावी हथियार बनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस सौदे को लेकर कोई शक नहीं है और कोर्ट इस मामले में अब कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहती है। विमान खरीद प्रक्रिया पर भी कोई शक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि हमने राष्ट्रीय सुरक्षा और सौदे के नियम कायदे दोनों को जजमेंट लिखते समय ध्यान में रखा है।
2. राम जन्मभूमि
राम मंदिर का मुद्दा काफी 2018 में गरमाया रहा। पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली विशेष खंडपीठ ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सिर्फ मालिकाना हक के वाद के रूप में ही विचार करने और तमाम हस्तक्षेपकर्ताओं को दरकिनार करने का निश्चय करके यह सुनिश्चित किया कि इस संवेदनशील मामले में जल्द से जल्द सुनवाई शुरू हो सके।
3. इच्छा मृत्यु
सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के संविधान पीठ ने लिविंग विल (इच्छा मृत्यु) को मंजूरी दी। कोर्ट ने इच्छा मृत्यु में पैसिव यूथेनेशिया को इजाजत देते हुए सुरक्षा उपायों के लिए गाइडलाइन जारी की है। सुनवाई में संविधान पीठ ने कहा था कि जीने के अधिकार में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी शामिल है। अब हम हम ये कहेंगे कि गरिमापूर्ण मृत्यु पीड़ारहित होनी चाहिए। कुछ ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए जिसमें किसी की भी गरिमपूर्ण तरीके से मृत्यु हो सके।
4. व्यभिचार कानून
सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ ने 27 सितंबर को आईपीसी की धारा 497 व्यभिचार कानून को खत्म कर दिया। फैसला सुनाते हुए देश के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि यह अपराध नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुराने व्यभिचाररोधी कानून को रद्द कर दिया और कहा है कि व्यभिचार अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि यह तलाक का आधार हो सकता है, लेकिन यह कानून महिला के जीने के अधिकार पर असर डालता है। कोर्ट ने कहा कि पति महिला का मालिक नहीं है और जो भी व्यवस्था महिला की गरिमा से विपरीत व्यवहार या भेदभाव करती है वह संविधान के कोप को आमंत्रित करती है। जो प्रावधान महिला के साथ गैरसमानता का बर्ताव करता है वह असंवैधानिक है। कोर्ट ने कहा कि यह कानून महिला की चाहत और सेक्सुअल च्वॉयस का असम्मान करता है।
5. समलैंगिकता अपराध नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि समलैंगिकता अपराध नहीं है। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने एकमत से ये फैसला सुनाया। करीब 55 मिनट में सुनाए इस फैसले में धारा 377 को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को अतार्किक और मनमानी बताते हुए कहा कि LGBT समुदाय को भी समान अधिकार प्राप्त है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन प्राथमिकता बाइलॉजिकल और प्राकृतिक है। अंतरंगता और निजता किसी की निजी च्वाइस है। इसमें राज्य को दखल नहीं देना चाहिए। इन मामलों में किसी भी तरह का भेदभाव मौलिक अधिकारों का हनन है। धारा 377 संविधान के समानता के अधिकार आर्टिकल 14 का हनन करती है।
6. आधार कार्ड की अनिवार्यता
सुप्रीम कोर्ट ने 26 सितंबर, 2018 को आधार कार्ड के वैधता को कायम रखते हुए इसकी कुछ सीमाएं तय करते हुए आधार अधिनियम की धारा 57 को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा था कि निजी कंपनियां आधार नहीं मांग सकेंगे। इसके अलावा कोर्ट ने बैंक खाता खुलवाने, मोबाइल कनेक्शन लेने के लिए आधार के अनिवार्यता को खत्म कर दिया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि सीबीएसई, यूजीसी, निफ्ट और कॉलेज आधार नंबर की मांग नहीं कर सकते हैं। स्कूल में दाखिले के लिए भी आधार नहीं मांगा जा सकता। किसी बच्चे को आधार के बिना सरकारी योजनाओं का लाभ देने से मना नहीं किया जा सकता।
7. सबरीमला मंदिर
केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 28 सितंबर को अहम फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से अपने फैसले में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर लगे बैन को हटा दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब सबरीमाला मंदिर के दरवाजे सभी महिलाओं के लिए खोल दिए गए हैं। अभी तक 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की इजाजत नहीं थी।
8. पदोन्नति में आरक्षण
26 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसले के विरूद्ध दायर की गई पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया था। दायर की गई याचिका में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को सरकारी नौकरी में पदोन्नति के समय आरक्षण देने के मांग पर विचार करने के लिए कहा था। इस याचिका को अदालत ने ठुकरा दिया।
9. दहेज प्रताड़ना
दहेज उत्पीड़न के मामलों में पति व उसके परिवार की तुरंत गिरफ्तारी को लेकर भी पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा ने बड़ा फैसला सुनाया था। फैसले के मुताबिक इन मामलों में आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी पर से रोक हटा लिया गया था। अगर अब कोई महिला अपने पति और उसके परिवार के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए के तहत दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराती है तो उनकी तुरंत गिरफ्तारी मुमकिन हो सकेगी।
10. दागी राजनेताओं पर रोक
आपराधिक गतिविधियों व आपराधिक छवि के नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में पूर्व सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाया था। अदालत ने पांच वर्ष या उससे अधिक सजा के मामले में आरोप तय होने के बाद उम्मीदवार के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और इस मामले पर कानून बनाने का काम संसद पर छोड़ दिया था।
11. जनप्रतिनिधि वकील कर सकते हैं प्रैक्टिस
पूर्व न्यायधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें पेशे से वकील जनप्रतिनिधियों के देशभर की अदालतों में प्रैक्टिस करने पर रोक लगाने की मांग की गई थी। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि कानून अदालतों में उनके प्रैक्टिस करने पर कोई पाबंदी नहीं लगा सकता है।
12. अदालती कार्यवाही का सीधा प्रसारण
संसद की तरह अब जल्द ही उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय सहित सभी अदालतों की सुनवाई का सीधा प्रसारण किया जाएगा। पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने अदालत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण को हरी झंडी दे दी है। अदालत ने कहा कि अब लोगों को अदालत आने की जरूरत नहीं पड़ेगी। भारत में अदालत सबके लिए खुली हैं।
Published on:
26 Dec 2018 03:02 pm
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