
Prime Minister's Agriculture Irrigation Scheme in bhilwara
नई दिल्ली। एक ताजा शोध के मुताबिक भारत को 2050 तक देश को करीब 40 करोड़ और लोगों का पेट भरना होगा, जबकि पहले से ही देश कुपोषण और पानी की कमी से जूझ रहा है। शोध के अनुसार, इसके मद्देनजर भारत को चावल और गेहूं के बजाय पर्यावरण के लिए बेहतर और स्वास्थ्यवर्धक फसलें उगाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
पोषण बेहतर करना है लक्ष्य
यह शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के एक दल ने किया है। इसका उद्देश्य भारत सरकार के दो प्रमुख लक्ष्यों के लिए काम करना है, ताकि देश में पोषण बेहतर हो सके और सतत जल उपलब्धता को प्रोत्साहित किया जा सके। फिलहाल भारत की एक तिहाई जनसंख्या एनीमिया से पीड़ित है और देश के भारी हिस्से में पानी की कमी है। इसका कारण कृषि सिंचाई के लिए काफी मात्रा में जल की निकासी और मानसून में बारिश का कम होना है।
खाद्य सुरक्षा जरूरी
भारत में भोजन प्रमुख रूप से अनाज की फसलों पर निर्भर है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि मौजूदा पसंदीदा भोजन देश की समस्याओं को बढ़ा रहा है। शोध का नेतृत्व करने वाली कोलंबिया यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक डॉ. काइली डेविस कहती हैं, "अगर हमने चावल और गेहूं को ही प्रमुख खुराक बनाए रखा, तो अरक्षणीय संसाधनों के इस्तेमाल और बढ़ती जलवायु परिवर्तनशीलता में बढ़ोतरी के साथ हम इसे जारी नहीं रख सकेंगे। यही कारण है कि हम खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय लक्ष्यों को बेहतर तरीके से तय करने के तरीकों के बारे में सोच रहे हैं।"
पानी की कमी भी है समस्या
शोधकर्ताओं ने भारत में फिलहाल उगाए जा रहे छह अनाजों पर ध्यान दिया, जिनमें चावल, गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी शामिल हैं। शोध के नतीजे साइंस एडवांसेज जर्नल में छपे हैं। इसमें खुलासा हुआ है कि भारत में चावल सबसे कम जल कुशल अनाज है और बढ़ती सिंचाई की मांगों के चलते गेहूं पानी की कमी के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था। इसके साथ ही शोधकर्ताओं ने कैलोरी, प्रोटीन, आयरन और जिंक जैसे तत्वों के आधार पर भी फसलों के पोषक तत्वों पर ध्यान दिया।
नतीजे बताते हैं कि मौजूदा प्रमुख फसलों की बजाए मक्का, बाजरा, रागी या ज्वार को उगाने से आयरन की उत्पादकता में एक चौथाई और जिंक में एक दहाई का ईजाफा किया जा सकता है।
गौरतलब है कि भारत में चावल और गेहूं के ऊपर भारी निर्भरता की वजह 1960 के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति थी। इस दौरान कृषि तकनीकी यंत्रों की व्यापक पहुंच ने फसलों की पैदावार में भारी ईजाफा किया। जहां इन नई तकनीकों और यंत्रों ने देश भर में भुखमरी मिटाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इनकी वजह से पर्यावरण को भी काफी नुकसान पहुंचा। इसकी वजह इनसे निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें और प्रदूषण थे।
खानपान की प्राथमिकता बदलना मुश्किल
डॉ. डेविस के मुताबिक एक अरब से ज्यादा लोगों की खानपान की प्राथमिकता को बदलना बहुत मुश्किल हो सकता है। लेकिन कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर वैकल्पिक फसलों की खपत काफी भारी तादाद में होती है। कई राज्य इन फसलों पर पहले से ही काफी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और भारत सरकार ने 2018 को 'बाजरा वर्ष' के रूप में मनाने को कहा है।
वे कहती हैं कि अगर सरकार ज्यादा से ज्यादा लोगों को बाजरा खाने के लिए प्रोत्साहित कर लेती है, तो इसका उत्पादन भी इसी के अनुरूप होगा। अगर ज्यादा मांग होगी तो लोग ज्यादा दाम देने को तैयार होंगे और किसान भी इसे ज्यादा उगाएंगे। इस कृषि क्रांति को लाने के लिए सरकार को भी चाहिए कि वे गेहूं-चावल में दी जाने वाली मौजूदा सब्सिडी-सहायता की ही तरह छोटे किसानों को बाजरा उगाने में भी मदद दे, ताकि उत्पादन में बढ़ोतरी हो।
Published on:
06 Jul 2018 04:11 pm
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