
नई दिल्ली। मनुष्य का जन्म ही कर्मो के अधीन होता है, हर क्षण कर्म करते रहना उसका स्वभाव है भगवान श्री कृष्ण ने रक्तरंजित कुरुश्रेत्र कि भूमि पे, अर्जुन को कर्म का ही उपदेश दिया था, भाई-बहन, माता-पिता, गुरु-शिष्य, सखा-सहपाठी, इन रिश्तों का सत्य के सामने, अपने कर्तव्य के सामने, और मातृभूमि के सामने कोई मोल नहीं, ये भगवान श्री कृष्ण ने बताया था।
दूसरे विश्वयुद्ध के समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था। इसलिए आधिकारिक रूप से भारत ने भी नाजी जर्मनी के विरुद्ध 1939 में युद्ध की घोषणा कर दी. गुलाम भारत के लगभग 2 लाख से अधिक सैनिक युद्ध के लिए भेज दिये गए थे। इसके अलावा सभी देशी रियासतों ने युद्ध के लिए बड़ी मात्रा में अंग्रेजों की आर्थिक मदद की थी।
भारत इस शर्त के साथ इस युद्ध में लड़ा था कि युद्ध समाप्ति के बाद भारत को आज़ाद कर दिया जाएगा. देश की 17 बटालियन जिसमें सिख, जट और राजपुताना सैनिक शामिल थे, को युद्ध के लिए इम्फाल भेजा दिया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध से ही इम्फाल सुर्खियों में आया था, जापान की सेना ने भारत में इसी क्षेत्र से प्रवेश किया और क्षेत्र भर में युद्ध छेड़ दिया था. इम्फाल की लड़ाई और कोहिमा की लड़ाई का द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास में काफी उल्लेख किया गया है। इम्फाल में भारतीय सेना ने जापानी सेना को लोहे के चने चबवा दिये।
बेशक भारतीय सैनिकों ने ये युद्ध अंग्रेजों की और से लड़ा लेकिन लड़ा तो अपनी मात्र भूमि के लिए ही था। भारत की सेना को कमजोर समझ रहे जापान की सेना को मुंह की खानी पड़ी। भारतीय सेना ने अपने पराक्रम से जापनी सेनिकों को परास्त कर दिया। जापानी सैनिकों को मैदान छोड़कर बर्मा भागना पड़ा तब ऐसा पहली बार हुआ था कि, किसी ने क्रूर जापानी फ़ौज को एशियाई मिट्टी पर हराया था।
भारत इस शर्त के साथ इस युद्ध में लड़ा था कि युद्ध समाप्ति के बाद भारत को आज़ाद कर दिया जाएगा। देश की 17 बटालियन जिसमें सिख, जट और राजपुताना सैनिक शामिल थे, को युद्ध के लिए इम्फाल भेजा दिया गया था. द्वितीय विश्व युद्ध से ही इम्फाल सुर्खियों में आया था, जापान की सेना ने भारत में इसी क्षेत्र से प्रवेश किया और क्षेत्र भर में युद्ध छेड़ दिया था।
इम्फाल की लड़ाई और कोहिमा की लड़ाई का द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास में काफी उल्लेख किया गया है। इम्फाल में भारतीय सेना ने जापानी सेना को लोहे के चने चबवा दिये। बेशक भारतीय सैनिकों ने ये युद्ध अंग्रेजों की और से लड़ा लेकिन लड़ा तो अपनी मात्र भूमि के लिए ही था। भारत की सेना को कमजोर समझ रहे जापान की सेना को मुंह की खानी पड़ी. भारतीय सेना ने अपने पराक्रम से जापनी सेनिकों को परास्त कर दिया। जापानी सैनिकों को मैदान छोड़कर बर्मा भागना पड़ा तब ऐसा पहली बार हुआ था कि, किसी ने क्रूर जापानी फ़ौज को एशियाई मिट्टी पर हराया था।
Published on:
12 Jan 2018 03:48 pm
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