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जब एक मुसलमान ने बचाई थी महाराणा प्रताप की जान

हल्दीघाटी में युद्ध में एक मुसलमान ने अपनी जान को दांव पर लगाकर महाराणा प्रताप की रक्षा की थी।

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Chandra Prakash Chourasia

May 09, 2018

Maharana Pratap

नई दिल्ली। राजा महाराणा प्रताप का नाम इतिहास में वीरता का दूसरा नाम है। 9 मई, 1540 को पैदा होने वाले महाराणा प्रताप की मौत 29 जनवरी, 1597 को हुई थी। मात्र 57 साल में उम्र में उनकी पराक्रम को देख दुनिया के महान शासक भी नतमस्तक हो गए। उनकी जिंदगी से जुड़ी अनेकों किवदंतियां आज भी लोग बड़े शान से सुनते और सुनाते हैं।

1576 में महाराणा प्रताप और मुस्लिम शासक अकबर के बीच हल्दीघाटी का युद्ध हो रहा था। इस युद्ध को इतिहास में महाभारत की तरह विनाशकारी माना जाता है। अबकर की सेना सेनापति मानसिंह के नेतृत्व में युद्ध के मैदान में अपना कौशल दिखा रही थी। मानसिंह करीब 50 हजार घुड़सवार और 35 हजार पैदल सैनिकों के साथ आगे बढ़ रहे थे। लेकिन वीर महाराणा प्रताप सिर्फ बीस हजार सैनिकों के साथ अकबर की सेना को लोहा ले रहे थे।

महाराणा प्रताप चेतक पर सवार को दुश्मनों के सिर धड़ से अलग करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। ये देख मानसिंह भयभीत हो गए। उन्होंने अपनी सेना का ध्यान प्रताप की ओर किया। जिसके बाद सैनिकों ने उनपर हमला बोल दिया। वैसे तो 10 हजार सैनिकों पर राणा का वार भारी पड़ता था। लेकिन कहा जाता है कि जब सैनिकों ने उनपर हमला किया तो वो संभल नहीं पाए और सेना उनपर हावी होने लगी। ये देख माहाराणा प्रताप के वफादार हकीम खान सूर मैदान में कूद गए और अकबर की सेना का वार खुद सहन कर उनकी जान बचा ली। हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की ओर से लड़ने वाले हकीम खान सूर इकलौते मुस्लिम सरदार थे।

हल्दीघाटी युद्ध में न अकबर की जीत हुई थी और न ही महाराणा प्रताप की हार। बताया जाता है कि अकबर ने खुद राणा के पास 6 शांति दूतों को भेजा था। अकबर युद्ध को शांति पूर्ण ढंग से खत्म करना चाहते था। लेकिन राणा हर बार अकबर के प्रस्ताव को ठुकरा देते थे और कहते कि राजपूत योद्धा तलवार उठाने के बाद बगैर जीते मैदान नहीं छोड़ता है।

बताया जाता है कि महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो वजनी था और उनकी छाती के रक्षा कवच का वजन 72 किलो था। कहा जाता है कि राणा खुद 7 फुट 5 इंच लंबे थे और उनका वजन 101 किलो था।

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