
जलियावालां बाग नरसंहार के 100 सालः मेरे ऊपर लाशों का ढेर लग गया था और दम घुटता जा रहा था...
नई दिल्ली। "मैं एक दीवार की तरफ भागा और लाशों के ढेर-घायल पड़े व्यक्तियों के ऊपर गिर पड़ा। कई अन्य लोग मेरे ऊपर गिर पड़े। मेरे ऊपर गिरे कई लोगों के गोली लगी थी और मर चुके थे। मेरे ऊपर मरे हुए और घायल व्यक्तियों का ढेर लग चुका था। मेरा दम घुट रहा था। मुझे लग रहा था कि मैं मरने वाला हूं।" यह बयान है मौलवी गुलाम जिलानी का, जो आज से 100 साल पहले यानी 13 अप्रैल 1919 को पंजाब में अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार के साक्षी रह चुके हैं।
हालांकि, जिलानी आज जीवित नहीं हैं, लेकिन उनका यह बयान नाइजेल कोलेट द्वारा लिखी किताब 'द बुचर ऑफ अमृतसरः जनरल रेजिनाल्ड डायर' में छपा हुआ है। 2005 में छपी इस किताब में कई स्रोतों से प्राप्त जानकारी को आधार बनाकर इस नरसंहार की भयावहता और इससे पहले और बाद के घटनाक्रम को लिखा गया है। इसी किताब की पृष्ठ संख्या 262 में इस नरसंहार के चश्मदीद मोहम्मद इस्माइल का बयान भी शामिल है। पेशे से कसाई इस्माइल ने इस नरसंहार को एक घर की छत से देखा था।
इस्माइल के मुताबिक, "जब गोरखा चले गए, तब मैं अपने मामा के बेटे को ढूंढ़ने बाग पहुंचा। हर तरफ लाशें बिखरीं हुई थीं। कई घायल लोग भी थे। वहां पड़े लोगों की संख्या का अनुमान लगाऊं तो यह तकरीबन 1500 रही होगी। वहां विशेषरूप से कुएं के पास रियाजुल हसन के घर के दोनों किनारों, साथ ही मेवा सिंह के बुर्ज के पास और मंच के सामने कुएं के आसपास जहां से सैनिकों ने गोलियां चलाई थी, लाशों के बड़े ढेर पड़े थे। मैंने कई बच्चे मरे पड़े देखे। मंडी के खैर-उद-दीन तेली अपनी गोद में छह या सात माह के अपने बच्चे को लिए हुए थे।"
नाइजेल कोलेट अपनी किताब में चश्मदीद सरदार प्रताप सिंह के हवाले से लिखते हैं, "दीवार के हर तरफ लाशें पड़ी हुई थीं। जब मैं अंदर पहुंचा, एक मरणासन्न आदमी ने पानी पिलाने के लिए कहा। वहां पर एक नाला था जो नहर से दरबार साहिब (स्वर्ण मंदिर) में पानी ले जाता था। इसे हंसली कहते हैं। यह नाला ढका हुआ है, लेकिन इससे जुड़ा एक गड्ढा है जो तकरीबन चार वर्गफीट का है। जब मैंने इससे पानी निकालने की कोशिश की, तब मुझे इसमें कई लाशें उतराती नजर आईं। कई जिंदा व्यक्तियों ने भी खुद को इसमें छिपाया हुआ था, और उन्होंने मुझे पूछा, 'क्या वो (सैनिक) चले गए?' जब मैंने उन्हें बताया कि वे चले गए हैं, वे इससे बाहर निकले और भाग गए।"
"तब मैं बाग के बीच में अपने बेटे को खोजने पहुंचा। वहां बाग की दीवारों के पास तकरीबन 800-1000 घायल और मृतक पड़े हुए थे, जबकि तमाम घायल या गोली लगे लोग वहां से भाग चुके थे और या तो अपने घर में या आसपास की गलियों में मर गए थे। मैं वहां 15 से 20 मिनट तक रहा, लेकिन अपने बेटे को नहीं ढूंढ सका। मैंने वहां उनके रोने की आवाजें सुनीं जिन्हें गोली लगी थी और जो पानी मांग रहे थे।"
वहीं, इस किताब के लेखक नाइजेल लिखते हैं कि 13 अप्रैल की शाम के इस नरसंहार के बाद रात 8 बजे कर्फ्यू लगा दिया गया। इसलिए बाग में जो घायल पड़े थे रात भर वहीं रहे, जबतक अगली सुबह वहां से शवों को हटाने का काम नहीं शुरू हो गया।
ऐसा कोई तरीका नहीं था जिससे पता चल सके कि वहां कितने लोगों की जानें गईं। ना तो इरविंग और ना ही माइकल ओ'डायर ने मृतकों की संख्या को लेकर कोई जांच की और स्थानीय सरकार ने इस नरसंहार में मारे गए लोगों की गिनती के काम का पहला प्रयास दो माह बाद 25 जून को चालू किया।
इसके बाद तमाम लोगों ने यहां मारे गए लोगों की संख्या के बारे में अपना विचार दिया। अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर एफसी पुकले ने 3 सितंबर को मृतकों की संख्या 291 बताई। इसके बाद आधिकारिक संख्या बढ़ी और 10 सितंबर को भारत सरकार ने यह संख्या 301 बताई। वहीं, पंजाब के असिस्टेंट कमिश्नर ने इसे 415 बताया।
जबकि इलाबाहाद की सेवा समिति के सचिव ने इसकी संख्या 480 करार दी। अलग-अलग लोगों ने इसकी संख्या बताई जो बढ़कर 1800 तक पहुंच गई थी। हालांकि इस नरसंहार के लिए गठित हंटर कमेटी ने नवंबर 1919 तक सामने आए मामलों के आधार पर इसकी संख्या 379 बताई। इनमें 337 पुरुष, 41 लड़के और छह माह का एक बच्चा भी शामिल था। कमेटी का मानना था कि घायलों की संख्या संभवता मृतकों से तीन गुना रही होगी।
Updated on:
13 Apr 2019 03:01 pm
Published on:
13 Apr 2019 11:19 am

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