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इंदिरा गांधी विशेष: 10 पॉइंट में जानिए कैसे हुई थी पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या

31 अक्टूबर 1984 की सुबह, समय 9 बजे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की गई थी।

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Kapil Tiwari

Oct 31, 2017

indira gandhi

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उड़ीसा में चुनाव प्रचार के बाद इंदिरा गांधी 30 अक्टूबर को दिल्ली पहुंची थीं। 31 अक्टूबर की सुबह का समय इंदिरा आइरिश फिल्म डायरेक्टर पीटर उस्तीनोव को दे चुकी थीं। वे इंदिरा पर डॉक्यूमेंट्री बना रहे थे। वे इस सिलसिले में इंटरव्यू लेने आए थे। सुबह 8 बजे इंदिरा गांधी के निजी सचिव आरके धवन पहुंच चुके थे। 9 बज चुके थे। कुछ ही देर में इंदिरा एक अकबर रोड की ओर निकल पडीं। पेंट्री के पास हेड कॉन्सटेबल नारायण सिंह तैनात था। आरके धवन पीछे थे।

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इंदिरा उस गेट से थोड़ी ही दूर थीं जो एक सफदरजंग रोड को एक अकबर रोड से जोड़ता है। गेट के पास सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह था। साइट में संतरी बूथ में कॉन्सटेबल सतवंत सिंह स्टेनगन लिए खडा था। इंदिरा संतरी बूथ के पास पहुंचीं। बेअंत और सतवंत को हाथ जोड़ते हुए इंदिरा ने खुद कहा-नमस्ते। लेकिन किसी को अंदाजा भी नहीं था कि यह दोनों इंदिरा के नमस्ते का क्या जवाब देंगे। दोनों ने पॉइंट 38 बोर की सरकारी रिवॉल्वर निकाली और इंदिरा गांधी पर गोली दाग दीं। कुछ ही पल में बेअंत सिंह ने दो और गोलियां इंदिरा के पेट में दाग दीं। इंदिरा ने कहा यह क्या कर रहे हो। तभी संतरी बूथ पर खड़े सतवंत की स्टेनगन इंदिरा की ओर मुडी और उसने दनादन गोलियां बरसाना शुरू कर दीं। हर सेकेंड के साथ एक गोली चली। स्टेनगन की तीस गोलियों ने इंदिरा के शरीर को छलनी कर दिया था।

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हेड कॉन्सटेबल नारायण सिंह और आरके धवन अवाक थे। इतने में बेअंत सिंह ने कहा- जो करना था वो हमने कर लिया। अब तुम जो करना चाहो, वो करो।

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आरके धवन जोर से चीखे एंबुलेंस। पास में खड़े एसीपी दिनेश चंद्र भट्ट ने बेअंत और सतवंत पर काबू पा लिया। दोनों को तुरंत काबू में ले लिया। हेड कॉन्सटेबल नारायण सिंह डॉक्टर को बुलाने के लिए दौड़ा।

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अकबर रोड के लॉन में इंदिरा का इंतजार कर आइरिश डेलिगेशन को गोलियों की आवाज सामान्य पटाखे के जैसी लगी कयोंकि उन दिनों दिवाली का पर्व था। डायरेक्टर पीटर उस्तीनोव वहीं पर इंदिरा का इंतजार करते रहे।

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इतने में सोनिया गांधी और दूसरे सुरक्षाकर्मी भी पहुंच चुके थे। धवन और सोनिया ने मिलकर इंदिरा को उठाया। उस वक्त एक एंबुलेंस जो वहां रहती थी उसे बुलाया लेकिन एंबुलेंस नहीं आई। पता चला उसका ड्राइवर चाय पीने गया हुआ था। सोनिया-आरके धवन और बाकी सुरक्षाकर्मी इंदिरा को लेकर सफेद एंबेसेडर कार तक पहुंचे। कार से ही इंदिरा को एम्स लेकर भागे। लगातार खून बह रहा था। उस कमरे से एक बार फिर फायरिंग की आवाज आई जिसमें सुरक्षाकर्मी बेअंत और सतवंत को लेकर गए थे। बेअंत और सतवंत भागने की कोशिश में गोलियों से भून दिए गए। घायल इंदिरा को सोनिया, धवन लेकर पहुंचे एम्स एंबेसेडर में आगे बैठे आर के धवन, दिनेश भट्ट और पीछे सोनिया गांधी ने इंदिरा का सिर गोद में रखा था।

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बीबीसी संवाददाता सतीश जैकब को उनके सूत्र ने बताया कि एक कार जा रही है उसमें सोनिया बैठी है। जैकब ने तुरंत राजीव गांधी के निजी सचिव विन्सेट जॉर्ज को फोन मिलाया। सीधे कुछ पूछ नहीं सकते थे। उन्होंने जॉर्ज से पूछा ज्यादा सीरियस तो नहीं है मामला। उसने कहा कि सीरियस तो नहीं है लेकिन एम्स ले गए हैं।

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अब 9 बजकर 32 मिनट हो चुके थे। एम्स पहुंचते ही उन्हें इमरजेंसी वार्ड की तरफ पहुंचे जहां कुछ नए डॉक्टर थे। तुरंत ड्यूटी पर मौजूद सीनियर कार्डियोलॉडिस्ट को बुलाया गया यह डॉक्टर वेणुगोपाल थे। जो बाद में एम्स के प्रमुख भी बने। दर्जन भर सीनियर डॉक्टर मौके पर थे। समय के साथ सांस इंदिरा का साथ छोड़ रही थीँ

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बीबीसी संवाददाता सतीश जैकब एम्स पहुंच चुके थे। सतीश जैकब ने वहां से आते एक बुजुर्ग डॉक्टर से पूछा सब ठीक तो है ना। जान तो खतरे में नहीं है ना। उन्होंने मुझे बड़े गुस्से में देखा। कहा कैसी बात करते हो। अरे सारा जिस्म छलनी हो चुका है तो मैंने उनसे कुछ नहीं कहा। आईसीयू के बाहर आरके धवन थे। धवन से जैकब ने कहा धवन साहब, ये तो बहुत बुरा हुआ। धवन उन्हें थोड़ा सा घटनाक्रम बताया। जैकब के पास पक्की खबर थी कि इंदिरा गांधी को गोली मारी गई है।

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इंदिरा का ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव था। उन्हें 88 बोतल खून चढ़ाया। ऑपरेशन थिएटर के बाहर कांग्रेस के बड़े नेताओं की भीड़ थी। सांसें थम चुकी थी। दोपहर 2.10 ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर इंदिरा का पोस्टमॉर्टम करने के लिए फोरेंसिक विभाग से टी डी डोगरा को भी बुला चुके थे। उन्होंने पोस्टमार्टम किया तो इंदिरा के शरीर पर गोलियों के 30 निशान थे और कुल 31 गोलियां इंदिरा के शरीर से निकाली गईं। इसके बाद देख में सिख विरोधी दंगे भड़क गए थे।