जानिए क्यों और कैसे टूटते हैं ग्लेशियर और उत्तराखंड में क्यों आई भयानक आपदा

- विशेषज्ञ तलाश रहे वजह, ग्लोबल वॉर्मिंग और अपने ही किनारों के दबाव से टूटा होगा नंदादेवी ग्लेशियर!
- पहाड़ों पर गर्मियां अभी शुरू नहीं हुई हैं और सर्दियों में ग्लेशियर टूटने से जुड़े कारण भी उत्तराखंड में ग्लेशियर टूटने से सीधे तौर पर नहीं जुड़ते

नई दिल्ली. पहाड़ों पर अभी गर्मियां शुरू भी नहीं हुई हैं, ऐसे में अचानक नंदादेवी ग्लेशियर टूटा क्यों? सर्दियों के मौसम में इस तरह के ग्लेशियर एवलांच और लैंडस्लाइड से ही टूटते हैं। लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ होता नजर नहीं आता। फिलहाल विशेषज्ञ, एक बड़ी वजह ग्लोबल वॉर्मिंग व लगातार घटते इसके क्षेत्रफल को मान रहे हैं। 1980 के बाद से लगातार पहाड़ों का तापमान बढ़ रहा है, ऐसे में ग्लेशियर का इलाका तेजी से घटा है। उत्तर नंदादेवी ग्लेशियर की बात करें तो यह 7.7' कम हुआ है। दूसरी वजह ग्लेशियर के किनारों पर दबाव माना जा रहा है। तेजी से गलते ग्लेशियर में बीच से पानी का बहाव होता है, ऐसे में किनारों पर बर्फ का दबाव उन्हें टूटने पर मजबूर कर देता है। वैज्ञानिक संदीपन मुखर्जी का कहना है कि सर्दियों में बारिश व बर्फबारी ग्लेशियरों को रोके रखते हैं, इस साल ऊंचाइयों पर कम बर्फबारी हुई।

यह भी वजह हो सकती है-

तेजी से पिघल रहे हिमालयी ग्लेशियर, नजर रखने की जरूरत-
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक मनीष मेहता ने पिछले साल अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि अपर ऋषिगंगा कैचमेंट के आठ ग्लेशियर उत्तरी नंदा देवी, चांगबांग, रमनी बैंक, बेथरटोली, त्रिशूल, दक्षिणी नंदादेवी, दक्षिणी ऋषि बैंक और रौंथी बैंक के क्षेत्रफल में 10 फीसदी से ज्यादा की कमी देखी गई है। उत्तराखंड स्पेस एप्लिकेशन सेंटर के एमएसपी बिष्ट का मानना है कि हिमालयन ग्लेशियर ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं। हमें ऊपरी ऋषिगंगा के दूसरे ग्लेशियर पर भी नजर रखने की जरूरत है।

क्यों और कैसे टूटते हैं ग्लेशियर-
ग्लेशियर सालों तक भारी मात्रा में बर्फ के एक जगह जमा होने से बनता है। ये दो तरह के होते हैं- अल्पाइन ग्लेशियर और आइस शीट्स। पहाड़ों के ग्लेशियर अल्पाइन श्रेणी में आते हैं। पहाड़ों पर ग्लेशियर टूटने की कई वजहें हो सकती हैं। गुरुत्वाकर्षण की वजह से और दूसरा ग्लेशियर के किनारों पर तनाव बढऩे से। ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते बर्फ पिघलने से भी ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर अलग हो सकता है। जब ग्लेशियर से बर्फ का कोई टुकड़ा अलग होता है तो उसे काल्विंग कहते हैं।

बदलाव: पिघल कर होते हैं आगे-पीछे -

पेयजल का बड़ा स्रोत-
ग्लेशियर पृथ्वी पर पेयजल का सबसे बड़ा स्रोत हैं। सालभर पानी से लबालब रहने वाली नदियां अमूमन ग्लेशियर से ही निकलती हैं। गंगा का प्रमुख स्रोत गंगोत्री ग्लेशियर है, ऐसे ही यमुना नदी का स्रोत यमुनोत्री भी ग्लेशियर ही है।

ग्लोबल वार्मिंग का खतरा-
ग्लोबल वॉर्मिंग से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। पश्चिम अंटार्कटिका में थ्वाइट्स ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है। यह ग्लेशियर आकार मे ब्रिटेन के क्षेत्रफल से बड़ा है। इससे सालाना 35 अरब टन बर्फ पिघलकर समुद्र में जा रही है।

ऐसे आती है ग्लेशियर बाढ़-
ग्लेशियर फटने या टूटने से आने वाली बाढ़ का नतीजा बेहद भयानक हो सकता है। ऐसा आमतौर पर तब होता है जब ग्लेशियर के भीतर ड्रेनेज ब्लॉक होती है। पानी अपना रास्ता ढूंढ लेता है और जब वह ग्लेशियर के बीच से बहता है तो बर्फ पिघलने की दर बढ़ जाती है। उसका रास्ता बड़ा होता जाता है व बर्फ भी पिघलकर बहने लगती है। इसे आउटबस्र्ट फ्लड कहते हैं। ये आमतौर पर पहाड़ी इलाकों में आती हैं। कुछ ग्लेशियर हर साल टूटते हैं, कुछ दो या तीन साल में। कुछ कब टूटेंगे, इसका अंदाजा लगा पाना लगभग नामुमकिन होता है।

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विकास गुप्ता
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