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सरदार पटेल गृहमंत्री और उप-प्रधानमंत्री बने, लेकिन नहीं बन पाए प्रधानमंत्री, ये थे कारण

सरदार पटेल महात्मा गांधी की अहिंसक नीति से सहमत नहीं थे, जब उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया तो नेहरू उनसे खफा हो गए।

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Kapil Tiwari

Oct 31, 2017

sardar vallabh bhai patel

नई दिल्ली: आज भारत की आयरन लेडी इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि है, तो वहीं कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे और आयरन मैन के नाम से फेमस सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती है। सरदार वल्लभ भाई पटेल की अगर उपलब्धियों की बात की जाए तो अनेकों हैं। वो देश के गृहमंत्री और उप-प्रधानमंत्री तक रहे थे, लेकिन कभी देश के प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। आजादी के समय कांग्रेस संगठन पर पकड़ उनकी मजबूत थी। इसके बावजूद वो देश के पहले प्रधानमंत्री नहीं बन पाए, इसके पीछे कई कारण थे। जानिए ये कारण :


1. गांधी की अहिंसक नीति से नहीं थे सहमत
1917 में सरदार पटेल महात्मा गांधी के सत्याग्रह के साथ जुड़े लेकिन उन्होंने कभी भी खुद को गांधी के नैतिक विश्वासों व आदर्शों के साथ नहीं जोड़ा। उनका मानना था कि गांधी की संपूर्ण अहिंसा नीति, भारत के तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक परिप्रेक्ष्य में सही नहीं है। उन्हें व्यावहारिक, निर्णायक और यहां तक की कठोर भी माना जाता था। अंग्रेज उन्हें एक खतरनाक शत्रु मानते थे।

2. पटेल को पीएम उम्मीदवार चुनने से नेहरू हो गए थे खफा
1945-46 में हिंदुस्तान के आजाद होने तस्वीर दिखने लगी थी। ऐसे में जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना दोनों ही प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोए बैठे थे। कहा जाता है कि इस दौरान महात्मा गांधी ने दोनों को समझाने की कोशिश की थी, लेकिन जिन्ना और नेहरू ने अपने स्वार्थ के लिए देश को 2 टुकड़े करा दिए। उसी समय कांग्रेस के अधिवेशन मे सरदार पटेल को नेहरू की तुलना मे बहुमत से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार चुना। इस पर नेहरू ने कॉंग्रेस के विभाजन की धमकी तक दे डाली। गांधी को सरदार पटेल से बात करने को कहा। नेहरू के जुड़ाव ज्यादा होने के कारण गांधी ने पटेल से बात की और पटेल गांधी की बात टाल नहीं सके। उन्होंने देश के लिए प्रधानमंत्री का पद न लेने का फैसला किया।

3. राष्ट्रपति पद पर की कूटनीति
सरदार पटेल ने पीएम की कुर्सी छोड़ने के बाद राष्ट्रपति के पद पर अपने गुट के डॉ. राजेंद्र प्रसाद का नाम आगे कर दिया था। हालांकि नेहरू चाहते थे कि राज गोपालचारी राष्ट्रपति बनें। नेहरू ने एक दिन राजेंद्र प्रसाद के पास जाकर उनसे यह लिखवा लिया कि वे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ही नहीं हैं। जब इस बात का पता सरदार पटेल को चला तो वे नाराज हो गए और उन्होंने राजेंद बाबू से पूछा कि आपने ऐसा लिख कर क्यों दे दिया? इस पर उन्होंने कहा कि यदि कोई मुझसे पूछता है कि क्या आप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं तो यह बात मैं अपने मुंह से कैसे कह सकता हूं कि मैं उम्मीदवार हूं? नेहरू ने मुझसे जब ऐसा ही सवाल पूछा तो मैंने वैसा कह दिया। उनके मांगने पर मैंने यही बात लिख कर भी दे दी। जब पटेल ने राजेंद्र बाबू को राष्ट्रपति पद पर बिठाने की जरूरत बताई तो तब नेहरू ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के सामने यह धमकी दे डाली कि यदि राज गोपालाचारी राष्ट्रपति नहीं बनेंगे तो मैं नेता पद से इस्तीफा दे दूंगा। इस पर कांग्रेस के मुखर नेता डा. महावीर त्यागी ने साफ साफ यह कह दिया कि आप इस्तीफा दे दीजिए। हम नया नेता चुन लेंगे। फिर तो इस जवाहर लाल जी के मुख के सारे शब्द स्वत: बंद हो गए और फिर कभी इसने राजेंद्र प्रसाद के नाम का विरोध नहीं किया।

5. कश्मीर समस्या
पटेल कश्मीर को भी बिना शर्त भारत से जोडऩा चाहते थे पर नेहरू ने हस्तक्षेप कर कश्मीर को विशेष दर्जा दे दिया। नेहरू ने कश्मीर के मुद्दे को यह कहकर अपने पास रख लिया कि यह समस्या एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है। अगर कश्मीर का निर्णय नेहरू की बजाय पटेल के हाथ में होता तो कश्मीर आज भारत के लिए समस्या नहीं बल्कि गौरव का विषय होता।

7. आरएसएस पर प्रतिबंध
सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था। पटेल ने अगस्त 1948 में संघ के प्रमुख माधवराव सदाशिव गोलवरकर को पत्र लिखकर कहा कि संघ के अधिकतर नेताओं के भाषण सांप्रदायिक जहर से भरे हुए थे। हिंदुत्व के प्रचार के लिए मुस्लिम विरोधी अजेंडे के साथ चलना क्यों जरुरी है। इनसे ऐसा माहौल बना कि गांधीजी की हत्या हो गई।


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