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1965 युद्ध के इस हीरो से है देश अनजान, सीने पर बम बांध उड़ा दिया था पाकिस्तानी सैनिकों को

मोहिंद्र सिंह अपने सीने पर बम बांधकर पाकिस्तानी सीमा के अंदर कूद गए थे, जिसके बाद कई टैंक के साथ-साथ कई पाकिस्तानी सैनिक भी मारे गए थे।

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Kapil Tiwari

Aug 06, 2018

Mohinder Singh

Mohinder Singh

ऩई दिल्ली। पाकिस्तान के खिलाफ साल 1965 की जंग में कई वीर बहादुर सैनिकों की जिंदादिली के दम पर हिंदुस्तान ने पाकिस्तान को शिकस्त दी थी। जब इस जंग का जिक्र होता है तो कई ऐसे चेहरे सामने आते हैं जिनके शौर्य के किस्से हर हिंदुस्तानी का सीना चौड़ा कर देते हैं। ऐसे ही देश के एक वीर सपूत का नाम है मोहिंद्र सिंह, जिन्होंने इस जंग में पाकिस्तानी सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए थे।

सीने पर बम बांध मोहिंद्र ने रोका था पाकिस्तानियों को

जंग के दौरान एक समय ऐसा आया था, जब पाकिस्तानी सेना भारतीय जवानों पर हावी होती दिख रही थी। दरअसल, पंजाब बॉर्डर पर पाकिस्तानी टैंक आगे बढ़ रहे थे और इसी दौरान हमारे जवानों के पास गोला-बारूद खत्म होने की कगार पर था। यही वो समय था जब मोहिंद्र सिंह ने अपनी बहादुरी का शानदार परिचय दिया। 34 साल के मोहिंद्र सिंह ने अपने सीने पर बम बांधकर दुश्मन के टैंक के आगे छलांग लगा दी। बम फटते ही पाकिस्तानी टैंक के साथ सैनिक भी उस धमाके में उड़ गए।

पाकिस्तानी सेना आ गई थी बैकफुट पर

इसके बाद तो मानो पाकिस्तानी सेना की कमर सी टूट गई और मजबूर पाकिस्तानियों को पीछे हटना पड़ा। देश के लिए अपनी जान की बाजी लगाने वाले मोहिंद्र सिंह की शहादत से हर कोई हैरान था। उन्होंने पाकिस्तानियों को रोकने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। जांबाज मोहिंद्र सिंह हरियाणा के सिरसा के रहने वाले थे। डबवाली उपमंडल के मसीतां गांव में उनका घर था। उनके बलिदान की जानकारी उनकी कलाई पर बंधी घड़ी से हुई थी।

दो बेटियां हैं मोहिंद्र सिंह की

मोहिंद्र सिंह सेना की सिख रेजीमेंट के जवान थे। जब उन्होंने देश के लिए कुर्बानी दी तो उनकी बड़ी बेटी महज तीन साल की और छोटी बेटी एक साल की थी। वर्तमान में दोनों लड़कियों की शादी हो चुकी है और बच्चे भी हैं। एक पंजाब के जिला श्री मुक्तसर साहिब और दूसरी अमृतसर में अपनी ससुराल में हैं।

अमृतसर में जन्मे थे मोहिंद्र सिंह

मोहिंद्र सिंह का जन्म भी अमृतसर के गांव निक्की पदरी में 9 फरवरी 1931 में हुआ था। फरवरी 1948 में वह सेना में भर्ती हुए थे। उस समय उनकी उम्र महज 17 वर्ष थी। बाद में परिवार गांव मसीतां में आकर बस गया। 7 नवंबर 1948 से 23 अगस्त 1959 तक वह जम्मू एवं कश्मीर में नियुक्त रहे। बाद में 7 अक्टूबर 1963 से 1965 तक नेफा में तैनाती रही। 9 सितंबर 1965 को वह पाकिस्तान के साथ चल रही जंग में शहीद हुए। सर्विस के दौरान उन्हें जनरल सर्विस मेडल तथा सैन्य सेवा मेडल से भी सम्मानित किया गया था।

2008 में चली बसीं थी मोहिंद्र की पत्नी

शहीद मोहिंद्र सिंह की पत्नी जोगिंद्र कौर की मृत्यु साल 2008 में हो गई थी। वह करीब पांच साल तक सरकार से यही गुहार लगाती रहीं कि उनके पति की प्रतिमा चौक पर लगाई जाए। इसके लिए जोगिंद्र कौर ने सरकार को कई पत्र भी लिखे। साल 2003 में पंचायत ने प्रस्ताव पारित करके सरकार को भेजा था, लेकिन सरकार ने ध्यान नहीं दिया।

गांव के लिए मिसाल हैं मोहिंद्र सिंह

भले ही सरकार ने शहीद के परिवार की बात अनसुनी कर दी हो। लेकिन गांव मसीतां के युवा उनकी याद को चिरस्थायी बनाने के लिए प्रयासरत हैं। युवाओं ने शहीद मोहिंद्र सिंह मेमोरियल युवा क्लब का गठन कर रखा है। क्लब के प्रधान रोशन लाल के मुताबिक स्कूली बच्चों में देशभक्ति की भावना जागृत करने के लिए क्लब कार्य कर रहा है।