इसके बाद जहां भी बाबा जाते, वहां घाटी का मुद्दा उठाते। गांवों में लोग उनके जाने पर जो भी चढ़ावा देते, वह घाटी के लिए एकत्र करना शुरू कर दिया। उनके एक भक्त परमानंद रोजाना घाटी पर जाते और चट्टानों पर आग लगाते। आग से गर्म होने के बाद चट्टानों में विस्फोट होता और टुकड़े हो जाते। खुद बाबा भी वहां मौजूद रहते। यह सिलसिला चलता रहा, इसके बाद बाबा के चढ़ावे पर आने वाली राशि भी घाटी पर खर्च करना शुरू कर दिया।