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जानिए देश के दो नए माउंटेन मैन के बारे में, पहाड़ों को काटकर बनाई सड़क

राजाराम भापकर- सात पहाडियों को काटकर सड़क बनाई, लाल लंगोट वाले बाबा- घाटी को चीर डाला और 40 किलोमीटर लंबा रास्ता घटकर 3 किमी का रह गया

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Vikas Gupta

Aug 24, 2015

Two new mountain man

Two new mountain man

मुंबई। महाराष्ट्र के अहमदनगर से एक और माउंटेन मैन की कहानी सामने आई है। जिन्होंने दशरथ मांझी की ही तरह सड़क बनाने के लिए पहाड़ को काटने का श्रमसाध्य कार्य किया।

अहमदनगर जिले के गुंडेगांव में शिक्षक रहे 84 वर्षीय राजाराम भापकर ने पिछले 57 वषोंü में सात पहाडियों को काटकर 40 किलोमीटर लंबी सड़क बनाई। इस चमत्कार के लिए क्षेत्र में वह सम्मानित नागरिक हैं। भापकर को लोग प्यार से भापकर गुरूजी बुलाते हैं। भापकर कहते हैं कि स्वतंत्रता के समय गुंडेगांव को आसपास के गांवों से जोड़ने के लिए पेवात (पगडंडी) भी नहीं थी। उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की है। वर्ष 1957 से 1991 तक जिला परिषद की स्कूल में काम करने वाले भापकर जब कोलेगांव में काम करते थे तो उनके गांव के लोगों को वहां तक पहुंचने में तीन गांव पार करके आना होता था।

भापकर ने सरकारी अधिकारियों से 700 मीटर ऊंचे संतोषा पहाड़ी को काटकर सड़क बनाने के लिए कहा था। लेकिन कोई सहयोग नहीं मिलने पर अपनी साहस और प्रतिबद्धता से 57 वषोंü में उन्होंने 40 किलोमीटर लंबी सड़क बनाई जिसके बाद सात सड़कें बनीं जो उनके गांव को आसपास के गांवों से जोड़ती हैं।

इससे पहले देउलगांव से होते हुए कोलेगांव तक मार्ग 29 किलोमीटर लंबा था। भापकर ने पहाड़ी काटकर कच्ची सड़क बनाई जिससे यह घटकर 10 किलोमीटर रह गई। सड़क के काम में जिन लोगों ने उनका साथ दिया उन्हें उन्होंने अपनी जेब से भुगतान किया। उन्होंने कहा कि मैं अपने वेतन का आधा उन्हें भुगतान करने पर खर्च करता था। सड़क निर्माण पर सरकार की तरफ से एक भी रूपये खर्च नहीं किए गए। भापकर ने कहा कि उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद मिली सारी राशि और पेंशन सड़क निर्माण पर खर्च कर दी।

उन्होंने कहा कि मैं अपने वेतन का आधा उन्हें भुगतान करने पर खर्च करता था। सड़क निर्माण पर सरकार की तरफ से एक भी रूपया खर्च नहीं किया गया। एक ग्रामीण ने कहा कि पहले की पगडंडी से 1968 में एक साइकिल भी पास नहीं कर सकती थी। अब इस सड़क पर बड़े वाहन चलते हैं।

यह हैं राजस्थान के माउंटेन मैन- लाल लंगोट वाले बाबा

पत्नी के मौत के बाद 22 साल तक रोजाना छैनी-हथौड़े से पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बनाने वाले बिहार के दशरथ माझी जैसी ही कहानी राजस्थान में बूंदी के लाल लंगोट वाले बाबा की है। बाबा बजरंग दास ने भी सरकार का मुंह नहीं देखा और दर्जनभर गांवों के लोगों की राह आसान करने का बीड़ा उठाया। लोगों के सहयोग और मेहनत से मांडपुर घाटी को चीर डाला और 40 किलोमीटर लंबा रास्ता घटकर 3 किमी का रह गया। बाबा इन दिनों बूंदी में ही नृसिंह आश्रम में रहते हैं।

इसके बाद जहां भी बाबा जाते, वहां घाटी का मुद्दा उठाते। गांवों में लोग उनके जाने पर जो भी चढ़ावा देते, वह घाटी के लिए एकत्र करना शुरू कर दिया। उनके एक भक्त परमानंद रोजाना घाटी पर जाते और चट्‌टानों पर आग लगाते। आग से गर्म होने के बाद चट्‌टानों में विस्फोट होता और टुकड़े हो जाते। खुद बाबा भी वहां मौजूद रहते। यह सिलसिला चलता रहा, इसके बाद बाबा के चढ़ावे पर आने वाली राशि भी घाटी पर खर्च करना शुरू कर दिया।

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