
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने म्यांमार दौरे के आखिरी दिन देश के अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की मजार पर पहुंचे और उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसे कई जानकार मोदी की बेहतरीन राजनीतिक दांव मान रहे हैं, तो कई लोगों का कहना है कि यह उलटा भी पड़ सकता है। एक तरफ देश में मुगलकालीन इतिहास पर बहस है और केंद्र सरकार पर आरोप लगते रहे हैं कि वह मुगलों के इतिहास को मिटा रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री का मुगल बादशाह की मजार पर श्रद्धांजलि देना हैरत भरा तो है।
इस बीच यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि बहादुरशाह जफर की असली मजार का तो किसी को पता ही नहीं है। असल में आखिरी मुगल बादशाह को रंगून में कैद रखा गया था, जहां करीब 4 साल की कैद के बाद उनकी मौत हो गई। तब जफर की इच्छा की विपरीत उन्हें रंगून में दफन कर दिया गया। किसी भी विवाद और अराजकता से बचने के लिए अंग्रेज सरकार ने जफर की कब्रगाह को समतल कर दिया था, ताकि किसी को पता न चले। हालांकि बाद में रंगून में एक जगह मजार बना दी गई, लेकिन यह बहादुरशाह जफर की असली कब्रगाह नहीं है।
दिल्ली के महरौली में होना चाहते थे दफन
अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर को रंगून में ही दफन कर दिया था, लेकिन खुद मुगल बादशाह खुद को महरौली में सुपुर्द ए खाक करने के तमन्नाई थे। जफर चाहते थे कि दिल्ली के महरौली इलाके में उन्हें जमींदोज किया जाए। हालांकि उनकी यह आखिरी इच्छा पूरी नहीं हो सकी और इसी वजह से यह शेर भी मशहूर है कि, कितना बदनसीब है जफर दफ्न के लिए , दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में। वैसे महरौली में कई सूफी संतों की मजार हैं।
भाजपा और आरएसएस की मुश्किल
भाजपा और आरएसएस की मुगलों के प्रति नफरत किसी से छिपी नहीं है। भाजपा कार्यकर्ता से लेकर नेता मुगलों के खिलाफ बयान देते रहे हैं। भाजपा के समर्थकों के बीच भी मुगलों कालीन इतिहास को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का बहादुर शाह जफर की मजार पर जाना इनके लिए मुश्किल पैदा करने वाला है।
विरोधियों के लिए नई राजनीतिक मुसीबत
दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के इस कदम से उन धुर विरोधियों के सामने नई समस्या आ गई है, जो मोदी का हर हाल में विरोध करते हैं। इस मामले में उन्हें फिलहाल विरोध की राह नहीं सूझ रही है।
कौन हैं बहादुरशाह
सन् 1857 में आजादी की लड़ाई के दौरान बहादुर शाह जफर ने आंदोलन की अगुवाई की थी। बाद में ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कुचल दिया था और मुगल बादशाह को 1858 में म्यांमार भेज दिया था। सात नवंबर 1862 में उनका निधन हो गया। बाद में उनकी मजार बना दी गई और लोगों ने उन्हें संत की उपाधि दी।
Updated on:
07 Sept 2017 09:01 pm
Published on:
07 Sept 2017 08:49 pm
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