25 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

1857 की क्रांति नहीं अब 1917 का पाइका विद्रोह होगा देश का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय आदेश जारी कर पाइका विद्रोह को अगले सत्र से इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में शामिल करने वाला है।

2 min read
Google source verification
Paika rebellion of 1917

नई दिल्ली। अब तक 1857 की क्रांति को देश का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पढ़ने वालों जल्द ही एक एतिहासिक बदलाव देखने को मिलने वाला है। क्यों कि अब 1817 पाइका विद्रोह 1857 संग्राम की जगह लेने जा रहा है। इसके बाद से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में 1817 पाइका विद्रोह को जाना जाएगा। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय जल्द ही आदेश जारी कर पाइका विद्रोह को अगले सत्र से इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में शामिल करने वाला है।

पाइका विद्रोह के 200 वर्ष पूरे

केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा है कि 1817 के पाइका विद्रोह को अगले सत्र से इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में 'प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' के रुप में स्थान मिलेगा। जावडेकर ने पाइका विद्रोह के 200 वर्ष पूरा होने के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में इसकी घोषणा की। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार विद्रोह को 200 साल होने पर समारोह आयोजित करने के लिए 200 करोड़ रुपए की मदद भी देगी। सरकार की ओर से अधिकारिक आदेश जारी होने के बाद से पाइका विद्रोह को अंग्रेजों के खिलाफ होने वाला पहला स्वतंत्रता संग्राम माना जाएगा। कार्यक्रम के दौरान जावडेकर ये भी कहा कि छात्रों को 1817 के सही इतिहास पढ़ाए जाने की जरूरत है।

क्या है पाइका विद्रोह

दरअसल, पाइका ओड़िशा के गजपति शासकों के तहत कृषक मिलिशया समुदाय था, इस समुदाय ने लड़ाई के दौरान राजा को अपनी सैन्य सेवा उपलब्ध कराई थी। यही नहीं पाइका ने 1817 में ही बक्सी जगंधु विद्याधारा के नेतृत्व में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बगावत की थी। मानव संसाधन मंत्रालय से पूर्व ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक ने केंद्र सरकार से पाइका विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पहचान देने की अपील की थी। उड़ीसा में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था। पाइक लोगों ने भगवान जगन्नाथ को उड़िया एकता का प्रतीक मानकर बक्सि जगबन्धु के नेतृत्व में 1817 में यह विद्रोह शुरू किया था। शीघ्र ही यह आन्दोलन पूरे उड़ीसा में फैल गया किन्तु अंग्रेजों ने निर्दयतापूर्वक इस आन्दोलन को दबा दिया।