कांग्रेस में कलह की वजह बने पीरजादा, जानिए बंगाल में क्यों सभी दल उनसे मिलाना चाहते हैं हाथ

Highlights.

- पीरजादा अब्बास सिद्दीकी हुगली जिले में स्थित फुरफुरा शरीफ दरगाह के मौलाना हैं
- पश्चिम बंगाल में 31 प्रतिशत मुस्लिम वोटर हैं, जिन पर इस दरगाह का गहरा प्रभाव है
- माना जाता है कि ममता को मौलाना ने बनवाया था सीएम, इस बार उनकी दोस्ती कांग्रेस से है

 

नई दिल्ली।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो गई हैं। सभी दल और गठबंधन एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी पर निशाना साध रहे हैं। मगर कांगे्रेस में स्थिति दूसरी है। यहां आपस में ही तकरार हो रही है। पार्टी नेताओं के खिलाफ ही सख्त बयानबाजी की जा रही है। अमूमन यह तकरार अलग-अलग मुद्दे पर होती रही है। इस बार मुद्दा एक मौलाना है, जिसे लेकर पार्टी के जी-23 में वाला गुट पार्टी हाइकमान पर जुबानी तीर छोड़ रहा है।

जी-23 में शामिल आनंद शर्मा पश्चिम बंगाल मे पीरजादा अब्बास सिद््दीकी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट यानी आईएसएफ को कांग्रेस-वाममोर्चा गठबंधन में शामिल किए जाने पर खासे नाराज हैं। इससे पीरजादा को लेकर कांग्रेस उहापोह की स्थिति में है। आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस आलाकमान पीरजादा को इतनी तवज्जो दे रहा है।

तेजस्वी यादव बंगाल में ममता बनर्जी और असम में बदरुदीन की पार्टी संग करेंगे गठबंधन

मुस्लिम मतदाता में पैठ
दरअसल, पश्चिम बंगाल में पीरजादा अब्बास सिद्दीकी हुगली जिले में फुरफुरा शरीफ दरगाह के प्रमुख हैं। उनकी मुस्लिम वोटरों में अच्छी पैठ है। बंगाल में लगभग 31 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। माना जाता है कि राज्य में मुस्लिम मतदाता जिस दल की ओर झुकते हैं, करीब-करीब सत्ता उसी दल के हाथ होती है। ऐसे में यह जानना-समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि बंगाल के राजनीतिक समीकरण में पीरजादा क्या महत्व है और राज्य में हर दल पीरजादा को इतनी तवज्जो क्यों दे रहा है।

ममता को पीरजादा ने सौँपी सीएम की कुर्सी!
हालांकि, कहा यह भी जाता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सत्ता पर काबिज कराने में पीरजादा का अहम रोल रहा है। इस बात से खुद तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी इनकार नहीं करते, मगर खुलकर नहीं बोलते। बहरहाल, यह भी सही है कि अब पीरजादा ने खुद की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट बनाने का ऐलान किया है। राज्य की राजनीतिक को करीब से जानने वाले यह भी कह रहे कि पीरजादा अब ममता दीदी से काफी नाराज हैं, इसलिए उन्होंने खुद की पार्टी बनाई है। वहीं, तृणमूल के कुछ नेता दबी जुबान में कहते हैं कि पीरजादा की महत्वाकांक्षा बढ़ती जा रही है। पार्टी बनाने का ऐलान करना इसी की एक कड़ी है।

दरगाह की भूमिका अहम
बंगाल के मुस्लिम समाज पर फुरफुरा शरीफ दरगाह की भूमिका अहम है। मुस्लिम समुदाय पर इसका गहरा प्रभाव है। वामपंथी सरकार के दौरान इसी दरगाह की मदद से ममता बनर्जी ने सिंगूर और नंदीग्राम जैसे बड़े आंदोलन किए और सत्ता हासिल की। वर्ष 2011 में ममता बनर्जी की धमाकेदार जीत के पीछे मुस्लिम वोटरों का बड़ा योगदान रहा है। बंगाल की 294 सीटों में से करीब 90 सीटों पर मुस्लिम समुदाय के वोटरों का अच्छा प्रभाव है। सूत्रों की मानें तो कुछ महीनों पहले पीरजादा और ममता बनर्जी के बीच किसी बात को लेकर मतभेद हो गया था। सिद्दीकी ने यह भी दावा किया है कि ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री रहते हुए मुस्लिम समुदाय की अनदेखी की है।

क्या कांग्रेस सत्ता में आ पाएगी?
बहरहाल, चर्चाएं ऐसी भी हैं कि कांग्रेस से गठबंधन से ठीक पहले यानी पिछले महीने जनवरी में आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी पीरजादा से मुलाकात कर चुके हैं। तब ओवैसी ने दावा किया था कि उन्हें फुरफुरा शरीफ दरगाह के मौलाना पीरजादा का समर्थन हासिल है। ममता से नाराजगी और ओवैसी से बात नहीं बनने के बाद ही पीरजादा ने कांग्रेस-वाममोर्चा का रुख किया होगा। मगर उनका जाना कांग्रेस में कलह की वजह बन गया है। अब देखना यह होगा कि अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी मोल लेने के बाद क्या पीरजादा राज्य में कांग्रेस का सूखा खत्म करने में मददगार साबित होंगे?

Ashutosh Pathak
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned