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चंबल नदी के पानी को लेकर विवाद

चंबल नदी के पानी पर मध्यप्रदेश और राजस्थान के बीच खींचतान फिर चर्चा में है। प्रदेश ने अपने हिस्से का पानी मांगा है। सिंचाई के लिए चंबल नदी पर निर्भर किसानों की जरूरत का हवाला देते हुए प्रदेश शासन ने राजस्थान से नहर में पानी छोडऩे को कहा है। यह पहली बार नहीं है। चंबल नदी के जल को लेकर मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों राज्यों में विवाद पुराना है। हर साल गर्मियां आने से पहले विवाद गरमा जाता है। राजस्थान से कभी भी निर्धारित मात्रा में पानी मध्यप्रदेश को नहीं दिया जाता। इस बार भी यही हुआ।

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chambal river

चंबल नदी (फाइल फोटो)

प्रसंगवश. ग्वालियर. चंबल नदी के पानी पर मध्यप्रदेश और राजस्थान के बीच खींचतान फिर चर्चा में है। प्रदेश ने अपने हिस्से का पानी मांगा है। सिंचाई के लिए चंबल नदी पर निर्भर किसानों की जरूरत का हवाला देते हुए प्रदेश शासन ने राजस्थान से नहर में पानी छोडऩे को कहा है।

यह पहली बार नहीं है। चंबल नदी के जल को लेकर मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों राज्यों में विवाद पुराना है। हर साल गर्मियां आने से पहले विवाद गरमा जाता है। राजस्थान से कभी भी निर्धारित मात्रा में पानी मध्यप्रदेश को नहीं दिया जाता। इस बार भी यही हुआ। जब मध्यप्रदेश ने सिंचाई के लिए उसके हिस्से के 3900 क्यूसेक पानी की मांग की, तो राजस्थान की तरफ से पानी के बजाय तर्क दिए गए। टैल एंड यानी अटेर तक पानी नहीं पहुंचने की बात हर बार की जाती है, लेकिन इसमें आने वाली बाधाओं को दूर करने पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाता। कोई योजना नहीं बनाई जाती।

पहले भी सिंचार्ई के पानी को रोक दिए जाने के मामले सामने आते रहे हैं। यही कारण है कि मध्यप्रदेश के 60 हजार से अधिक किसानों के सामने गेहूं की फसल की सिंचाई का संकट है। भिंड-मुरैना में 1.50 लाख हेक्टेयर भूमि पर गेहूं की फसल को पानी की जरूरत है। मध्यप्रदेश और राजस्थान के बीच जल बंटवारे की जो शर्तें थी, उनको पड़ोसी राज्य ने कभी पूरा करने की चेष्टा नहीं की, बल्कि नहर में पानी नहीं छोड़ पाने के बहाने बनाता रहा। इसी पुरानी आदत को अब दोहराया गया है। इसको लेकर सियासत भी गरमा गई है। मध्यप्रदेश के जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है।

राजस्थान ने मध्यप्रदेश के हक मारने का काम किया है। राजस्थान ने चंबल नहर पर मध्य प्रदेश के विरोध के बाद भी 5 लिफ्ट इरिगेशन स्कीम व इसी संख्या में क्रॉस रेग्यूलेटर बना लिए। इनमें अतिरिक्त पानी की खपत होती है। उसकी मनमानी का हाल यह है कि चंबल की दाईं मुख्य नहर पार्वती एक्वाडक्ट से मिलने वाले पानी को पर्याप्त मात्रा में नहीं छोड़ा जा रहा है। इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष के दखल के बाद उम्मीद जागी है। अब देखना होगा कि इसका कितना असर होता है? क्योंकि यह केवल मध्यप्रदेश के किसानों की समस्या नहीं है। टैल एंड तक पानी नहीं पहुंचने से राजस्थान के हाड़ौती में भी किसानों का गुस्सा फूट रहा है।

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