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खाकी हाफ पैंट की जगह फुल पैंट पहनेंगे RSS के स्वयं सेवक 

राजस्थान के नागौर में चल रही आरएसएस की तीन दिवसीय कार्यशाला के अंतिम दिन इसका फैसला लिया गया

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Vikas Gupta

Mar 13, 2016

neemauch me rss ka path sanchalan

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नई दिल्ली। रविवार को ऐतिहासिक मेकओवर करते हुए आरएसएस ने अपने 90 साल पुराने ड्रेस कोड को बदल दिया। अब आरएसएस स्वयं सेवक खाकी हाफ पैंट की जगह भूरे रंग की फुल पैंट पहनेंगे। राजस्थान के नागौर में चल रही आरएसएस की तीन दिवसीय कार्यशाला के अंतिम दिन इसका फैसला लिया गया। संघ की नीति निर्धारक इकाई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की यहां आयोजित तीन दिवसीय सालाना बैठक में यह फैसला किया गया।

संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने कहा कि हमने खाकी निकर की जगह भूरे रंग की पैंट को गणवेश में शामिल करने का निर्णय लिया है। हम अडिय़ल रुख नहीं रखते और समय के अनुसार फैसले लेते हैं। साल 1925 में संघ की स्थापना के बाद से ढीला-ढाला खाकी निकर संगठन की पहचान रहा है। इस बारे में जानकारी देते हुए आरएसएस के सुरेश जोशी ने कहा कि हमारी पहचान केवल खाकी हाफ पैंट से ही नहीं है, बल्कि अन्य कई चीजें भी हैं, जो हमारी पहचान में शामिल हैं। जब हम नए रंग का उपयोग करना शुरू कर देंगे, तो लोगों को धीरे-धीरे इसकी आदत हो जाएगी।

जब शनिवार को बैठक में हाफ पैंट को बदलने का निर्णय लिया जा रहा था, तो कुछ सदस्यों ने पैंट का रंग बदलने के फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा। एक वरिष्ठ कार्यकर्ता का कहना है कि खाकी रंग एक प्रतीक है, जिसे नहीं बदला जाना चाहिए। ठीक उसी प्रकार से जैसे नीले रंग को दलितों से जोड़कर देखा जाता है, वैसे ही यह संघ का राजनीतिक प्रतीक है। अभी तक खाकी पैंट के साथ काली टोपी, सफेद शर्ट, भूरे मोजे और बांस का डंडा आरएसएस के पारंपरिक परिधान में शामिल रहे हैं, जिन्हें गणवेश कहा जाता है। शनिवार को इससे पहले जब यह खबर आई थी कि खाकी पैंट की जगह आरएसएस के स्वयंसेवक ग्रे रंग की पैंट पहनेंगे, तो इन खबरों को आरएसएस ने बेबुनियाद बताया था।

शनिवार को इससे पूर्व आरएसएस ने खबरों का खंडन करते हुए ट्वीट करके कहा था की आरएसएस के यूनिफॉर्म में बदलाव को लेकर अभी फैसला नहीं लिया गया है। चर्चा जारी है। बदलाव को लेकर जो खबरें चल रही हैं वो सही नहीं हैं। आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने बताया था कि 2010 में वर्दी में बदलाव का मुद्दा एक बैठक में उठाया गया था। लेकिन आम सहमति न बन पाने के कारण इसे 2015 तक टाल दिया गया था।

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