
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने असम में 48 लाख लोगों की नागरिकता को लेकर ऑल असम माइनॉरिटीज स्टूडेंट युनियन ( आमसू ) और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर आज सुनवाई पूरी कर ली । सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया है । बुधवार की हुई सुनवाई के दौरान असम सरकार की ओर से एएसजी तुषार मेहता ने कहा कि जिन 48 लाख महिलाओं को पंचायत द्वारा नागरिकता का प्रमाण पत्र दिया गया है उनका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है। हालांकि केंद्र सरकार ने इस दलील का न तो समर्थन किया और न ही विरोध किया।
गुवाहाटी हाईकोर्ट में दी गई चुनौती
आमसू की ओर से सलमान खुर्शीद ने कहा कि नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजनशिप के कोआर्डिनेटर ने अपने 16 दस्तावेजों में से एक दस्तावेज पंचायत द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र को भी सही माना है । लिहाजा ये पूरी तरह से कानूनी दस्तावेज है। दरअसल असम के ग्राम पंचायत सचिवों ने असम के 48 लाख लोगों को नागरिकता का प्रमाण पत्र दिया है जिसे गुवाहाटी हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी । गुवाहाटी हाईकोर्ट ने उन प्रमाणपत्रों को पब्लिक डॉक्युमेंट मानने से इनकार कर दिया और कहा कि ये प्राइवेट डॉक्युमेंट हैं । हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ आमसू समेत छह याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है ।
इस साल के अंत तक पूरी होगी प्रक्रिया
आमसू ने अपनी याचिका में कहा है कि ये जो प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं वे पब्लिक डॉक्युमेंट ही हैं । आमसू के वकील फुजैल अहमद अय्युबी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि इन प्रमाण पत्रों को अंतिम रुप देने में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, महानिबंधक और सुप्रीम कोर्ट की मर्जी रही है । ये 16 सहायक दस्तावेजों में से 13वें स्थान पऱ आता है । आमसू ने कहा है कि अगर इन लोगों के प्रमाणपत्र को सही नहीं माना जाएगा तो सबकी नागरिकता खत्म हो जाएगी और उन्हें विदेशी माना जाएगा । सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी से पूछा कि आखिर आपकी प्रक्रिया कब पूरी होगी तो एनआरसी के कोआर्डिनेटर ने कहा कि ये इस साल के अंत तक पूरी हो जाएगी ।
असम के लिए बांग्लादेशी घुसपैठ का मामला
ये मामला राजनीतिक तौर पर काफी संवेदनशील रहा है। वर्तमान मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल आठवे दशक में चले उस असम आंदोलन की ही उपज है, जिसका मुख्य मुद्दा बांग्लादेशी घुसपैठ रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में इस समस्या का समाधान करने का वादा ही उन्हें और भाजपा को सीएम की कुर्सी तक ले गया। हालांकि, एनआरसी में अपडेशन का काम पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में किया जा रहा है। इस बारे में राजनीतिक बयान देने पर अदालत ने सोनोवाल को फटकार भी लगाई थी। इसीलिए अब सबकी निगाह सुप्रीम कोर्ट के रुख पर है, जहां यह तय होना है कि क्या पंचायत सेक्रेटरी सर्टिफिकेट, जिसपर राजस्व अधिकारी के भी हस्ताक्षर होते हैं, नागरिकता पंजीकरण के लिए मान्य होंगे या नहीं। अय्युबी कहते हैं, आखिर यह कौन बता सकता है कि किसी महिला के बाबूजी कौन है? जहां उसका जन्म हुआ है, उस गांव के लोग ही ऐसा कर सकते हैं। इसीलिए आवासीय प्रमाणपत्र के रूप में इसे राज्य सरकार, केंद्र सरकार, रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकृत माना था। हाईकोर्ट ने इसे अमान्य करते हुए एकतरह से सुप्रीम कोर्ट की भी अनेदेखी की है।'
उबाल पर है ये मामला
असम में यह मुद्दा इनदिनों उबाल पर है। यह माना जा रहा है कि अवैध घुसपैठ करनेवालों के लिए गांवबूढ़ा को प्रभावित कर फर्जी प्रमाणपत्र हासिल कर लेना कोई मुश्किल काम नहीं है। अय्युबी भी यह मानते हैं कि ऐसा संभव है। इसीलए वह ऐसे दस्तावेजों को री-वेरीफाइ कराने पर जोर दे रहे हैं। उधर असम में गरमाए इस मामले में पिछले दिनों मुसलिम संगठनों ने सरकार पर आरोप लगाया था कि वह राज्य में म्यामांर जैसी स्थिति उत्पन्न कर रही है। जमीयत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने नई दिल्ली में यह बयान देकर विवाद को और बढा दिया है कि 'यदि 50 लाख लोगों को नागरिकता रजिस्टर से बाहर किया जाता है तो राज्य जलने लगेगा। हम या तो मारेंगे या मरेंगे।'
मुस्लिम आबादी में बेतहाशा वृद्धिः -
- 2011 की सेंसस रिपोर्ट में यह पाया गया कि असम के कुछ जिलों में मुस्लिम आबाद में बेतहाशा वृद्धि हुई है। धुबरी जिले में तो यह बढ़ोतरी 80 फीसदी तक दर्ज की गई। उसके बाद यह मुद्दा एकबार फिर से गरमा गया। जिसका राजनीतिक फायदा2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिला। विदेशी घुसपैठ पर लंबी लडाईलड़नेवाले सोनोवाल को सीएम पद का प्रत्याशी घोषित करने करनाभी एक मास्टर स्ट्रोक था।
Published on:
22 Nov 2017 09:38 pm
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