बाहरी ग्रहों पर जीवन की संभावनाएं तलाशने के लिए वैज्ञानिक अपना रहे नई तकनीक

Highlights.
- नई तकनीक की मदद से संबंधित ग्रह पर जीवन है या नहीं इसका पता कम समय में लग जाता है
- जीवन की अनुकूलता वाले ग्रहों पर पानी तरल अवस्था में हो और वायुमंडल की मौजूदगी जरूरी है
- उन्नत टेलिस्कोप की मदद से ग्रहों की काफी करीब से तस्वीर ली जाती है और उनका गहन अध्ययन होता है

 

नई दिल्ली।
वैज्ञानिक चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो, हर वक्त किसी न किसी नई खोज में लगे रहते हैं। ऐसी खोज, जो बेहतर और सकारात्मक विकास में क्रांतिकारी साबित होती हो। अब खगोल विज्ञानियों को ही ले लीजिए। पृथ्वी से बाहर और किन ग्रहों पर जीवन की संभावनाएं हो सकती हैं, हमेशा इसकी तलाश में लगे रहते हैं। चाहे ग्रह कितना भी दूर हो और वहां तक जीवन के संकेत तलाशने में ही वर्षों लग जाएं, मगर वह जूझते रहते हैं।

अब यह अलग बात है कि कई वर्षों की मेहनत के बाद अंत में उन्हें निराशा हाथ लगती है, मगर वे हार नहीं मानते और अपनी तलाश जारी रखते हैं नई तकनीक विकसित करने और नए ग्रह की खोज में।

इसी सकारात्मक ऊर्जा का परिणाम है कि सफलता एक दिन जरूर मिलती है। अब जैसे ही वैज्ञानिकों ने वह नई तकनीक हासिल कर ली है, जिसकी मदद से वे नए ग्रहों पर जीवन की संभावनाएं हैं या नहीं, इसका पता पहले से बेहद कम समय में लगा सकते हैं। इसके अलावा, वे इस तकनीक की मदद से ग्रह को, चाहे वह जितना भी दूर हो, करीब से देख सकते हैं और उन्नत टेलिस्कोप की मदद से वहां की तस्वीरें लेकर अपनी खोज शुरू कर सकते हैं।

दरअसल, बाहरी ग्रह यानी वाह्य ग्रह हमारे सौर मंडल के बाहर किसी तारे का चक्कर लगाने वाले उस ग्रह को कहते हैं, जो पृथ्वी से इतनी दूरी पर हो कि वहां जीवन पनपने की संभावना अधिक रहे। इन ग्रहों को ही वाह्य ग्रहों की श्रेणी में रखा जाता है। हालांकि, इन ग्रहों पर जीवन के लिए जरूरी स्थितियां होना आवश्यक है। मसलन, ये पथरीले ग्रह हों। यहां पानी तरल अवस्था में भी हो और वायुमंडल की मौजूदगी भी होनी चाहिए।

अब तक इन ग्रहों को धरती से एक तारे के समान छोटे धब्बे के तौर पर देखा जा सकता था। मगर नई तकनीक की मदद से अब इन ग्रहों की तस्वीर उन्नत टेलिस्कोपों मदद से काफी करीब तक ली जा सकती है। मिड इन्फ्रारेड एक्सोप्लेनेट इंमेजिंग के लिए नया सिस्टम बनाया गया है। इसमें लंबे वक्त तक ली गई तस्वीरों का गहन अध्ययन होता है। अभी तक गुरु या उससे बड़े आकार के ही वाह्य ग्रहों की खोज हो सकती थी। ऐसे ग्रह या तो बहुत करीब होते हैं या फिर बहुत दूर।

Ashutosh Pathak
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