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#Metoo टॉफी की लालच में मैं उनके पास चली गई और उन्होंने ऐसी गंदी हरकत की

#Metoo राजू भैया की सब बहुत तारीफ करते थे, पर मुझे वे पसंद नहीं थे। वे अक्सर मुझे प्यार करने के बहाने दबोच लेते थे।मेरे गालों और होंठो को चूमते थे

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Chandra Prakash Chourasia

Oct 17, 2017

Metoo

नई दिल्ली। पत्रिका.कॉम यौन उत्पीड़न के खिलाफ शुरु हुई इस #Metoo कैंपेन के तहत आपने पाठकों तक कुछ ऐसी आपबीती पहुंचा रहा है, जो सोशल मीडिया पर शेयर हो रही हैं।


मेरी बचपन की सहेली रिया जब मां बनी, तो उसने अपनी अच्छी-खासी जॉब छोड़ दी। अपनी बेटी साक्षी की देखभाल के लिए वह पूरे वक्त उसके साथ रहना चाहती थी। आज उसकी बेटी छह साल की है। बहुत दिनों बाद जब रिया से मेरा मिलना हुआ, तो बातों-बातों में ही मैंने उससे कहा- तू वापस जॉब जॉइन क्यों नही कर लेती? अब तो साक्षी स्कूल भी जाने लगी है। इस पर उसने जवाब दिया- मैं अपनी बेटी को बिल्कुल भी अकेला नहीं छोडऩा चाहती। जमाना बहुत खराब है। इसके दादा-दादी साथ रहते, तो बात अलग थी। पर किसी बाहर वाले के भरोसे बेटी को छोडऩे की हिम्मत नहीं होती।

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रिया कह तो सही रही थी। पर मुझे यह बात हमेशा खलती थी कि कॅरिअर को लेकर इतनी महत्वाकांक्षी लड़की सिर्फ इसलिए घर में बैठी है, क्योंकि समाज में बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। मैंने उससे कहा- तेरी सोसायटी में तेरी एक-दो इतनी अच्छी सहेलियां हैं। तू उनके पास भी तो साक्षी को छोड़ सकती है। रिया ने कहा- औरतों पर तो एक बार भरोसा कर भी लूं, लेकिन मर्द? उनके घरों के मर्दों का क्या भरोसा?? ये मर्द कब हैवान बन जाते हैं, पता नहीं चलता! किसके अंदर कितना बड़ा जानवर छुपा है, अक्सर बाहर से देखने में पता नहीं चलता। फूल-सी नाजुक बच्चियों को मसलते हुए शर्म तक नहीं आती इंसान के भेष में छुपे इन भेडिय़ों को। इतना कहकर रिया ने पास खेल रही साक्षी को कसकर अपनी बांहों में छुपा लिया। जैसे कि दुनिया की बुरी नजर से उसे बचाना चाहती हो।

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फिर उसने साक्षी को चूमकर खेलने के लिए छोड़ दिया। मैं सोच ही रही थी कि क्या कहूं, तभी उसने आगे बोलना शुरू किया- मैं नहीं चाहती कि जो मेरे साथ हुआ, वो मेरी बेटी के साथ भी हो।


#Metoo..... तुझे पता है, जब मैं बहुत छोटी थी। उम्र रही होगी यही कोई छह-सात साल! शाम को मोहल्ले के सब बच्चे खेलने निकलते थे। मैं भी पड़ोस की आंटी के यहां अक्सर चली जाती थी। वे मुझे बहुत प्यार करती थीं। मां की बहुत अच्छी सहेली भी थीं वो। उनके बेटे राजू भैया की सब बहुत तारीफ करते थे, पर मुझे वे पसंद नहीं थे। वे अक्सर मुझे प्यार करने के बहाने दबोच लेते थे। मेरे गालों और होंठो को चूम लेते थे। मुझे अजीब तो लगता था, पर कुछ समझ नहीं आता था। ऐसे ही एक दिन उन्होंने मुझे टॉफी देने के बहाने अपने कमरे में बुलाया। आंटी बाहर किसी से बात करने में व्यस्त थीं। टॉफी की लालच में मैं उनके पास चली गई और उन्होंने मेरे साथ बहुत अजीब हरकत की। जिसके बाद मैं रोते हुए कमरे के बाहर आ गई। आज भी मैं किसी पर भरोसा नहीं कर पाती।

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यह सब बताते-बताते रिया की आंखें छलक आईं। मैंने उसे गले से लगाया, तो वह फफक-फफक कर रो ही पड़ी। उस वक्त ऐसा लगा, जैसे वह इतनी बड़ी और एक परिपक्व मां नहीं, बल्कि वही छह-सात साल की बच्ची है, जो इंसान के भेष में छुपे एक जानवर का शिकार बनते-बनते बची थी। सच है, कहां भुलाई जाती हैं ऐसी घिनौनी बातें? सारी उम्र कड़वी याद बन कर दिल के किसी कोने में छुपी रहती हैं। उसे चुप कराते हुए मेरे मन में भी समाज की वे गंदी तस्वीरे एक-एक करके घूम रही थीं, जो आए दिन हम लड़कियों और महिलाओं को देखनी पड़ती है। ये बेहद शर्मनाक घटनाएं कभी हमारे आसपास किसी लड़की के साथ घटती हैं, कभी हमारे खुद के साथ! ज्यादातर हम चुप रह जाते हैं। पर अब बोलना होगा, समाज की यह गंदी सच्चाई सामने लानी होगी।


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